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Ram Navami 2022 LIVE Updates: राम नवमी ,भगवान श्रीराम की कृपा पाने के लिए कर लें ये चमत्कारी उपाय

Deepa KalraDeepa KalraUpdated 10 Apr 2022 01:00 PM IST
Ram Navami 2022 LIVE Updates: राम नवमी ,भगवान श्रीराम की कृपा पाने के लिए कर लें ये चमत्कारी उपाय

Special Things

LIVE Ram Navami (राम नवमी) 2022 Puja Vidhi Shubh Muhurat हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस बार राम नवमी 10 अप्रैल,रविवार को है। राम नवमी पर रवि पुष्य योग,सर्वार्थसिद्धि योग एवं रवि योग का त्रिवेणी संयोग बन रहा है। शास्त्रों के अनुसार नवमी तिथि पर भगवान राम का जन्म हुआ था,इसलिए इस शुभ तिथि को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। भगवान राम अयोध्या के राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के पुत्र थे। भगवान श्रीराम को विष्णु जी का 7वां अवतार माना जाता है। आइए जानते हैं कि रामनवमी पर कौन से खास उपाय है जिन्हें करने से आपको जीवन में सुख-समृद्धि और शांति मिलती है।
इस शुभ समय पर होगी चैत्र नवरात्रि घटस्थापना

चैत्र नवरात्रि के दौरान मनाए जाने वाले अधिकांश रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों का आरंभ समय होता है नवरात्रि का आरंभ ही घट स्थापना से होता है जिसे कलश स्थापना के नाम से भी जाना जाता है. प्रत्येक लोग अपने अपने अनुसर इस दिन घट स्थापना को करते हैं. कुछ लोग ब्राह्मणों द्वारा घट स्थापना करवाते हैं तो कुछ लोग स्वयं ही इस कार्य को संपन्न करते हैं . घटस्थापना एक अत्यंत पवित्र शुभ कार्य होता है. इसमें साधक भक्ति का आनंद प्राप्त करता है तथा देवी का आशीर्वाद उसे पूर्ण रुप से प्राप्त होता है. आईये जानें इस चैत्र नवरात्रि के दिन कब कर सकते हैं घट स्थापना और कैसे प्राप्त कर सकते हैं माता का आशीर्वाद. 

घटस्थापना मुहूर्त और संधि पूजा मुहूर्त नवरात्रि के दौरान अधिक लोकप्रिय हैं और इन मुहूर्तों की आवश्यकता होती ही है. घटस्थापना नवरात्रि के महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक है. यह नौ दिनों के उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है. हमारे शास्त्रों में नवरात्रि की शुरुआत में एक निश्चित अवधि के दौरान घटस्थापना करने के लिए अच्छी तरह से परिभाषित नियम और दिशानिर्देश दिए गए हैं. 

चैत्र नवरात्रि कलश- घट स्थापना समय 

2 अप्रैल 2022 को शनिवार के दिन से चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन का आरंभ होगा. प्रतिपदा तिथि का आरंभ शुरू - 01 अप्रैल, 2022 को पूर्वाह्न 11:53 से शुरु होगी और  02 अप्रैल, 2022 को पूर्वाह्न 11:58 तक प्रतिपदा तिथि व्याप्त होगी. इसलिए उदय कालीन तिथि के नियम अनुसार 2 अप्रैल का दिन ही नवरात्रि के आरंभ का समय होगा.  2 अप्रैल 2022 को घटस्थापना मुहूर्त का आरंभ  06:10 पूर्वाह्न से शुरु होकर 08:31 तक रहेगा. यह समय अवधि 02 घंटे 21 मिनट तक की होगी. जो लोग इस समय घट स्थापना नहीं कर पाते हैं तो उनके लिए पुन: घटस्थापना अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक रहेगा. 

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चैत्र नवरात्रि घटस्थापना मुहूर्त पर बन रहे हैं विशेष योग

घटस्थापना देवी शक्ति का आह्वान है और इसे शुभ समय पर करने से शक्ति का संतुलन जीवन में बना रहता है, शास्त्रों में कहा गया है, देवी शक्ति का आधार है इसलिए इन नौ दिनों में की जाने वाली अराधना किसी न किसी रुप में साधक को प्रभावित अवश्य करती है.  अमावस्या और रात के समय घटस्थापना वर्जित होती है इसलिए 1 अप्रैल को अमावस्या तिथि व्याप्त होगी ओर 11:53 से प्रतिपदा का आरंभ होगा किंतु 1 अप्रैल के दिन यह कार्य नही किया जाएगा और 2 अप्रैल को ही घट स्थापना का कार्य करना ही उपयुक्त और शुभ होगा. 

घटस्थापना करने के लिए सबसे शुभ या शुभ समय दिन का पहला एक तिहाई भाग होता है जबकि प्रतिपदा तिथि व्याप्त होती है. 2 अप्रैल को नल नामक विक्रम संवंत का आरंभ होगा. रेवती नक्षत्र और ऎन्द्र योग की शुभता भी इस समय पर होगी. घट स्थापना के समय द्वि-स्वभाव लग्न को मुहूर्त में शामिल करने का प्रयास किया जाता है. चैत्र नवरात्रि के दिन घटस्थापना समय मीन लग्न व्याप्त होगा 


नवरात्रि के दौरान घटस्थापना पूजा विधि
घटस्थापना पूजा विधि नवरात्रि के महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक है. इस समय पर शुचिता ओर शुद्धि का पूर्ण पालन होता है. घटस्थापना के लिए उपयोग में आने वाली वस्तुओं में धान्य बोने के लिए चौड़ा और खुला मिट्टी का बर्तन चाहिए होता है, अनाज बोने के लिए स्वच्छ मिट्टी, जौ के बीज, जल हेतु कलश, पवित्र धागा, मोली, कलावा, सुगंधित वस्तुएं, इत्र, सुपारी, कलश में डालने के लिए सिक्के, अशोक या आम के पेड़ के पत्ते, अक्षत, श्रीफल, लाल वस्त्र, लाल शृंगार वस्तुएं, फूल और माला, दूर्वा, 

घटस्थापना के लिए कलश की तैयारी को देवी और अन्य देवताओं का आह्वान करने से पहले किया जाता है. सबसे पहले मिट्टी का चौड़ा घड़ा लेते हैं ओर इसमें मिट्टी की पहली परत को बर्तन में फैलाते हैं फिर अनाज के बीज फैलाते हैं अब मिट्टी और अनाज की दूसरी परत डालते हैं और बीजों को जल से सिंचते हैं. पवित्र धागे को जल के कलश के गले में बाँधते हैं कलश में सुपारी, गंध, दूर्वा घास, अक्षत और सिक्के डालते हैं तथा कलश को ढकने से पहले अशोक के 5 पत्तों को कलश के किनारे पर लगा देते हैं. नारियल को लाल धागे या लाल कपड़े में लपेट देते हैं. कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है. देवी दुर्गा को पूजन करने के लिए कलश तैयार हो जाता है. अब देवी दुर्गा का आह्वान करते हैं तथा उनसे प्रार्थना करते हैं अपने निवास में पधारने की और नौ दिनों तक कलश में निवास करके सभी को आशीर्वाद प्रदन करने की. 

पंचोपचार पूजा आरंभ होती है. सबसे पहले कलश और उसमें बुलाए गए सभी देवताओं को धूप- दीपक से पूजन किया जाता है. उसके बाद फूल और सुगंध अर्पित करते हैं. अंत में पंचोपचार पूजा समाप्त करने के लिए कलश को नैवेद्य यानी फल और मिठाई अर्पित करते हैं इस प्रकार घट स्थापना का पूजन संपन्न होता है. इस अवसर पर हवन यज्ञ इत्यादि कार्य भी घटस्थापना हेतु किए जाते हैं. 

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद

क्यों मनाई जाती है चैत्र नवरात्रि जाने पौराणिक कारण। 


नवरात्रि के पावन अवसर पर हम आपको बतायेंगे की चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि क्यों मनाई जाती है और साथ ही यह भी बतायेंगे की यह एक दूसरे से कैसे अलग है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय धरती पर महिषासुर नामक राक्षस का आतंक बहुत बढ़ गया था। सभी उसके अत्याचारों से दुखी थे। ऐसे में देवताओं ने उससे युद्ध किया परंतु वह उसे हरा नही पाये। क्योंकि महिषासुर को वरदान प्राप्त था कि कोई भी देवता या दानव उसे हरा कर उस पर विजय प्राप्त नही कर पायेगा। ऐसे में सभी देवताओं ने धरती को महिषासुर के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए माता पार्वती को प्रसन्न किया और उनसे रक्षा करने का अनुरोध किया। सभी देवताओं के अनुरोध पर माता पार्वती ने अपने अंश से नौ रूप प्रकट किये। जिन नौ रूपो को सभी देवताओं ने अपने शस्त्र देकर शक्ति से संपन्न किया था। यह कार्य चैत्र महीने की प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर नौ दिन तक चला था, तभी से इन नौ दिनों को चैत्र नवरात्रि के रूप में मनाया जाने लगा।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन रामनवमी का पर्व मनाया जाता है। वहीं शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन दशहरे का पर्व मनाया जाता है। चैत्र पक्ष की नवमी तिथि के दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। इसलिए चैत्र नवरात्रि की नवमी का दिन राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। वही शारदीय नवरात्रि में भगवान श्रीराम ने 9 दिन तक देवी दुर्गा की आराधना कर दसवें दिन रावण का वध किया था जिसकों विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। साथ ही शारदीय नवरात्रि की दशमी के दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का मर्दन किया था।

चैत्र नवरात्रि में की गई साधना साधक को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है और आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति करती है। वहीं शारदीय नवरात्रि में की गई साधना सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने में सहायक होती है।

अधिक जानकारी के लिए आप Myjyotish के अनुभवी ज्योतिषियों से बात करें।

नवरात्रि के दिन माता के कौन से स्वरूप कि होती है उपासना। 


चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस बार 2 अप्रैल को देवी शैलपुत्री की पूजा की जायेगी। यह नवरात्रि का प्रथम दिन होता है। इस दिन सभी लोग अपने घर में देवी की चौकी लगाते है और उसपर कलश की स्थापना करते है। इस दिन सभी भक्त पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखते है। देवी शैलपुत्री दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण करती है। देवी शैलपुत्री सर पर अर्धचंद्र धारण करती है।

नवरात्रि के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। ज्ञान और दृढ़ संकल्प का प्रतिनिधित्व करती है देवी ब्रह्मचारिणी। अबकी बार 3 अप्रैल को देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जायेगी।

नवरात्रि के तीसरे दिन बाघ की सवारी करने वाली देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यह देवी शांति का प्रतिनिधित्व करती है और साथ ही इनके माथे पर घंटे की आकृति में आधा चंदा विराजमान है। इसलिए इन्हें चंद्रघंटा देवी कहते है। इस बार चंद्रघंटा देवी की पूजा 4 अप्रैल को की जाएगी।

नवरात्रि के चौथे दिन देवी कुष्मांडा की पूजा की जाती है। मान्यता है कि देवी कुष्मांडा ने संसार की रचना में योगदान दिया था। देवी कुष्मांडा सिंह की सवारी करती है और यह अपने हाथों में घातक अस्त्र शस्त्र धारण करती है। इस बार देवी कुष्मांडा की पूजा 5 अप्रैल को की जाएगी।

नवरात्रि के पांचवें दिन देवी स्कंदमाता की पूजा की जाती है। देवी स्कन्दमाता की गोद में उनके पुत्र स्कंद होते हैं। देवी स्कंदमाता अपने हाथों में  कमल, कमंडल और घंटी धारण करती है। देवी स्कन्दमाता को उनके भक्तों की आत्मा को शुद्ध करने वाला माना जाता है। इस बार 6 अप्रैल को देवी स्कंदमाता की पूजा की जाएगी।

Chaitra Navratri 2022: दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद

नवरात्रि के छठवें दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। इस बार 7 अप्रैल को भक्त देवी कात्यायनी की पूजा करेंगे। देवी कात्यायनी का रूप माँ पार्वती ने  महिषासुर राक्षस का नाश करने के लिए धारण किया था।

नवरात्रि के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह देवी के नौ स्वरूपों में से सबसे भयंकर स्वरूप है। देवी कालरात्रि अपने एक हाथ में खड़क धारण करती है और दूसरे हाथ में खप्पर धारण करती है। इस बार देवी कालरात्रि की पूजा 8 अप्रैल को की जाएगी। जिन लोगों के घरों मे अष्टमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है वह आज के दिन उपवास रखते हैं।

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा की जाती है। माता महागौरी शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इस दिन कुछ परिवारों में कन्या पूजन किया जाता है। जिन भक्तों के घर में कन्या पूजन नवमी तिथि के दिन किया जाता है वह आज के दिन व्रत करते है। इस बार यह व्रत 9 अप्रैल को रखा जाएगा।

नवरात्रि के अंतिम और नौवें दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था और इस दिन को रामनवमी के पर्व के रूप में मनाया जाता है। आज के दिन देवी के भक्त कन्या पूजन करते हैं। इसमें नौ कन्याओं को अपने घर बुलाते हैं उनके चरण धुलवाकर उन्हें अपने घर में आदर से भोजन कराते हैं और उसके बाद भेंट देकर उन्हें विदा करते हैं।

9 दिन के कठिन पूजा पाठ और व्रत के बाद भक्त कन्या पूजन करने के पश्चात देवी के प्रसाद को ग्रहण कर अपना व्रत खोलते हैं और देवी से उन पर सदा अपनी कृपा बनाए रखने के लिए प्रार्थना करते हैं।


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नवरात्रि में करें माँ अम्बे को ऐसे प्रसन्न। 


नवरात्रि के नौ दिन देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना की जाती है। देवी दुर्गा के सभी स्वरूपों को भिन्न भिन्न वस्तुयें प्रिय है। आज हम आपको देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों के प्रिय पुष्प और भोग के बारे में बताएंगे। इस नवरात्रि प्रितिदिन उनके प्रिय पुष्प और भोग अर्पित करने से देवी दुर्गा आपसे जल्द ही प्रसन्न हो जायेगी और आपकी पूजा का भी आपको शुभ फल प्राप्त होगा।

नवरात्रि के प्रथम दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है। देवी के भक्त देवी को गुलहड़ का पुष्प अर्पित करे क्योंकि यह इनका प्रिय पुष्प है। आपको देवी जी को शुद्ध देसी घी से बनी मिठाई अर्पित करनी चाहिये। इससे आपकी पूजा जरूर शुभ फल देगी।

नवरात्रि के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। देवी ब्रह्मचारिणी का प्रिय पुष्प सेवंती/गुलदाउदी है। देवी ब्रह्मचारिणी को उनके भक्त शक्कर और मिश्री का भोग लगाये। इससे देवी माँ आपसे प्रसन्न होंगी।

नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटी की पूजा होती है। देवी चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाई का भोग प्रिय है। देवी के भक्त देवी को कमल के पुष्प अर्पित करें। देवी को कमल का पुष्प प्रिय है।

नवरात्रि के चौथे दिन देवी कुष्मांडा की पूजा होती है। देवी कुष्मांडा को मिष्ठान में मालपुआ और चमेली का पुष्प प्रिय है। जो भक्त देवी को यह अर्पित करते है देवी उनसे अति प्रसन्न होती है।

नवरात्रि के पांचवे दिन देवी स्कंदमाता की पूजा भक्तो द्वारा की जाता है। देवी स्कंदमाता को पीली वस्तुयें प्रिय है। जैसे कि फल में केला और पुष्प में पीले पुष्प प्रिय है।

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नवरात्रि के छठे दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी कात्यायनी को गेंदे के पुष्प और शहद प्रिय है। भक्त देवी को नवरात्रि के छठे दिन यह दोनों जरूर अर्पित करें।

नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। देवी कालरात्रि को कृष्ण कमल के पुष्प और नैवेध में गुड़ प्रिय है। जो भी देवी को यह अर्पित करते है देवी उनसे जरूर प्रसन्न होती है।

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा होती है। माता को चमेली और बेला के पुष्प प्रिय है। बात करे नैवेध की तो देवी को नारियल अति प्रिय है। आप देवी को नारियल से बनी मिठाई अर्पित कर सकते है।

नवरात्रि के अंतिम दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। जो भक्त देवी सिद्धिदात्री की कृपा चाहते है वह देवी को चंपा के पुष्प और तिल से बनी मिठाई अर्पित करें। यह दोनों चीजें देवी सिद्धिदात्री को प्रिय है।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। 


शक्ति की उपासना के 9 दिन। देवी दुर्गा से शक्ति और सिद्धि की कामना रखने वाले तरह-तरह के कठिन व्रत करते हैं। शक्ति की सिद्धि तभी श्रेष्ठ है जो वह आपके पास हमेशा रहे समय पड़ने पर साथ दें और जिससे आपको यश मिले। शक्ति रावण के पास भी थी। शक्ति से संपन्न कंस भी था।  लेकिन यह जीवन के उस पल में उस से हाथ धो बैठे जिस वक्त इन्हें इसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता थी। क्योंकि यह अधर्म के पक्ष में थे। शक्ति कोई संपत्ति नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी है । जब आपको प्रकृति से कोई ताकत मिलती है तो वे अकेले आपके लिए नहीं होती उस में परमात्मा का कोई संकेत होता है ,जो कहता है आपको किन के लिए शक्ति मिली, किन लोगों की सेवा और सहायता के लिए चुना गया है।

तीन बातों पर निर्भर करती है शक्ति की सिद्धि

शक्ति किसे दी तीन बातों पर निर्भर करती है संयम ,सत्य और सद्भाव। शक्ति उसी के साथ है जिसके जीवन में यह तीन भाव भीतर तक उतरे हुए हैं। पहला संयम ,शक्ति उसी के पास संचित रहती है जो संयम से रहता हो, असंयमित लोगों की शक्ति उन्हें समय पूर्व छोड़ देती है। दूसरा सत्य शक्ति सत्य के साथ रहती है। रामायण का युद्ध हो या महाभारत का कुरुक्षेत्र, शक्ति ने उसी का साथ दिया है जो सत्य के साथ था। असत्य के साथ देने वालों को शक्ति तत्काल छोड़ देती है। तीसरा सद्भाव ,जब शक्ति आए तो विनम्रता और समानता का भाव जरूरी होता है। शक्ति का यश उसी को मिलता है जो विनम्र हो लोगों के प्रति समान भाव रखें ।भेदभाव करने वाले को कभी शक्ति से यश नहीं मिलता।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

यदि आपको दिखे यह संकेत तो मिलने वाली है माँ अम्बे की कृपा


उल्लू देवी लक्ष्मी का वाहन है। वैसे तो इससे कई मान्यतायें जुड़ी है कोईमानता है कि घर पर उल्लू का बैठना शुभ है तो कोई मानता है उल्लू का जोड़ा घर पर बैठना शुभ होता है तो कोई इन बातों को अशुभता का संकेत मानता है। लेकिन आपको नवरात्रि या फिर नवरात्रि के बाद सपने में उल्लू दिखे तो यह बहुत शुभ माना जाता है। कहते है सपने में उल्लू दिखने से माँ लक्ष्मी का घर में आगमन होता है। साथ ही आने वाले समय में बहुत पैसे मिलने के योग बनते है जो कि जीवन को बेहतर बनाते है।

ननवरात्रि के नौ दिनों के दौरान या उसके बाद यदि आपको भोर में नारियल, हंस या फिर कमल का फूल दिखता है तो आप समझ ले आप पर मां दुर्गे मेहरबान होने वाली है। जल्द ही माता रानी आपकी किस्मत के ताले खोलने वाली है और आपकी किस्मत चमकने वाली है।

यदि आपको नवरात्रि के किसी भी दिन घर से निकलते ही गाय दिखते है तो यह एक शुभ संकेत होता है। वही यदि गाय मंदिर से बाहर निकलने पर दिखे तो यह और भी शुभ संकेत होता है। क्योंकि मंदिर से बाहर निकलते समय गाय दिखने का अर्थ है कि आपकी कोई मनोकामना जल्द ही पूरी होने वाली है।

पूर्णिमा का चांद, गंगा नदी, सूर्य, शिवलिंग, कन्या, मोर, दीपक, महल, फूलों की माला, रुद्राक्ष इन सभी चीजों का सपने में दिखना बहुत शुभ होता है। यह सब सपने में दिखना मंत्र के सिद्ध होने का इशारा होता है। साथ यदि आप खुद को सोने चांदी के बर्तनों में खाना खाते हुए देखते है तो यह भी बहुत शुभ माना जाता है।


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जानिए इस नवरात्री माँ आंबे बरसाएंगी किन राशियों पर अपनी कृपा 


इस वर्ष नवरात्रि पर कई शुभ सहयोग बन रहे है। जिससे यह नवरात्रि और महत्वपूर्ण हो जाती है।जानते है इस नवरात्रि माँ अम्बे की विशेष कृपा किन राशियों पर बरसेगी।

इस बार मेष राशि के जातकों पर मां अम्बे की विशेष कृपा होगी जिससे उन्हें हर कार्य मे सफलता मिलेगी और इनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। साथ ही इन्हें कार्य स्थल पर अपनी प्रतिभा दिखाने के कई अवसर मिलेंगे। इस राशि के जातक खूब मेहनत करे क्योंकि आपकी मेहनत व्यर्थ नही जाएगी आपकी मेहनत रंग लायेगी। 

वृषभ राशि के जातकों पर भी इस नवरात्रि माँ अंबे की विशेष कृपा रहेंगी। इस बार नवरात्रि का पर्व इस राशि के जातकों के लिए खुशियों की सौगात लेकर आ रहा है और साथ ही इनका भाग्य भी पूरा साथ दे रहा है। इस दौरान इस राशि के जातकों के लिए आय के कई नए स्रोत उत्पन्न होंगे और साथ ही यह लोग धन का संचय भी कर पाएंगे।

अगली राशि है कर्क राशि। इस राशि के जातकों की आर्थिक स्थिती पहले से बेहतर होगी और इनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। इस राशि के जातकों को इस नवरात्रि नौकरी में काफी लाभ मिलेगा और साथ ही कई अच्छे अवसर भी प्राप्त होंगे।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

सिंह राशि के जातकों पर भी इस बार माँ अंबे की विशेष कृपा रहेंगी। जिससे इस राशि के जातकों को अचानक से धन की प्राप्ति होगी और इनके रुके हुए काम इस समय अवधि में पूरे होने के योग बन रहे हैं। इस राशि के जातकों को किसी पुराने रोग से छुटकारा मिलने की भी संभावना है। इस राशि के जातकों के यात्रा के योग बन रहे हैं और साथ ही नौकरी में प्रमोशन मिल सकता है।

कन्या राशि के जातकों के लिए चैत्र नवरात्रि का पर्व मां अम्बे की विशेष कृपा लेकर आ रहा है। कन्या राशि के जातक जो व्यापारी हैं उन्हें धन की प्राप्ति के नए मार्ग मिलेंगे। इस राशि के लोगो का आर्थिक पक्ष मजबूत होगा और प्रेम संबंधों के लिहाज से भी यह समय अनुकूल है।

तुला राशि के जातकों के लिए भी यह नवरात्रि शुभ साबित होगी। इस राशि के जातकों के जीवन में सफलता के सुनहरे अवसर प्राप्त होंगे साथ ही सुख सुविधा में बढ़ोतरी होगी। इनके लिए धन एकत्र करने के नहीं माध्यम सामने आएँगे साथ ही इनकी सेहत भी अच्छी रहेंगी।

अधिक जानकारी के लिए आप Myjyotish के अनुभवी ज्योतिषियों से बात करें।

जानिए इस नवरात्री माँ आंबे बरसाएंगी किन राशियों पर अपनी कृपा


इस वर्ष नवरात्रि पर कई शुभ सहयोग बन रहे है। जिससे यह नवरात्रि और महत्वपूर्ण हो जाती है। जानते है इस नवरात्रि माँ अम्बे की विशेष कृपा किन राशियों पर बरसेगी।

इस बार मेष राशि के जातकों पर मां अम्बे की विशेष कृपा होगी जिससे उन्हें हर कार्य मे सफलता मिलेगी और इनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। साथ ही इन्हें कार्य स्थल पर अपनी प्रतिभा दिखाने के कई अवसर मिलेंगे। इस राशि के जातक खूब मेहनत करे क्योंकि आपकी मेहनत व्यर्थ नही जाएगी आपकी मेहनत रंग लायेगी। 

वृषभ राशि के जातकों पर भी इस नवरात्रि माँ अंबे की विशेष कृपा रहेंगी। इस बार नवरात्रि का पर्व इस राशि के जातकों के लिए खुशियों की सौगात लेकर आ रहा है और साथ ही इनका भाग्य भी पूरा साथ दे रहा है। इस दौरान इस राशि के जातकों के लिए आय के कई नए स्रोत उत्पन्न होंगे और साथ ही यह लोग धन का संचय भी कर पाएंगे।

अगली राशि है कर्क राशि। इस राशि के जातकों की आर्थिक स्थिती पहले से बेहतर होगी और इनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। इस राशि के जातकों को इस नवरात्रि नौकरी में काफी लाभ मिलेगा और साथ ही कई अच्छे अवसर भी प्राप्त होंगे।

सिंह राशि के जातकों पर भी इस बार माँ अंबे की विशेष कृपा रहेंगी। जिससे इस राशि के जातकों को अचानक से धन की प्राप्ति होगी और इनके रुके हुए काम इस समय अवधि में पूरे होने के योग बन रहे हैं। इस राशि के जातकों को किसी पुराने रोग से छुटकारा मिलने की भी संभावना है। इस राशि के जातकों के यात्रा के योग बन रहे हैं और साथ ही नौकरी में प्रमोशन मिल सकता है।

कन्या राशि के जातकों के लिए चैत्र नवरात्रि का पर्व मां अम्बे की विशेष कृपा लेकर आ रहा है। कन्या राशि के जातक जो व्यापारी हैं उन्हें धन की प्राप्ति के नए मार्ग मिलेंगे। इस राशि के लोगो का आर्थिक पक्ष मजबूत होगा और प्रेम संबंधों के लिहाज से भी यह समय अनुकूल है।

तुला राशि के जातकों के लिए भी यह नवरात्रि शुभ साबित होगी। इस राशि के जातकों के जीवन में सफलता के सुनहरे अवसर प्राप्त होंगे साथ ही सुख सुविधा में बढ़ोतरी होगी। इनके लिए धन एकत्र करने के नहीं माध्यम सामने आएँगे साथ ही इनकी सेहत भी अच्छी रहेंगी।

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नवरात्रि पूजन विधि।


सर्वप्रथम एक चौकी पर गंगाजल छिड़क कर शुद्ध करके उस पर लाल कपड़ा बिछाएं और मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। और कलश की स्थापना करें। कलश की स्थापना करने के बाद मां दुर्गा को लाल वस्त्र, लाल फूल, लाल फूलों की माला और श्रृंगार आदि की वस्तुएं अर्पित करें और धूप व दीप जलाएं। यह सभी वस्तुएं अर्पित करने के बाद गोबर के उपले से अज्ञारी करें। जिसमें घी, लौंग, बताशे,कपूर आदि चीजों की आहूति दें। इसके बाद नवरात्रि की कथा पढ़ें और मां दुर्र्गा की धूप व दीप से आरती उतारें और उन्हें प्रसाद का भोग लगाएं।

सभी 9 ग्रह अप्रैल में बदलेंगे राशि। 


इस बार अप्रैल ज्योतिष के लिहाज से बहुत खास है, क्योंकि इस महीने में सभी नौ ग्रह राशि बदल रहे हैं। ऐसा सैकड़ों सालों में होता है, तब एक ही महीने में सभी 9 ग्रह राशि बदलते हैं। 14 अप्रैल को सूर्य मीन से मेष राशि में प्रवेश करेगा। 7 अप्रैल को शुक्र मकर से कुंभ में प्रवेश करेगा। 8 अप्रैल को बुध ग्रह मीन से मेष राशि में और 24 अप्रैल को वृषभ राशि में जाएगा। 13 अप्रैल को गुरु कुंभ से मीन राशि में प्रवेश करेगा। 27 अप्रैल को शुक्र कुंभ राशि से मीन में जाएगा। 28 अप्रैल शनि मकर से निकलकर कुंभ में आ जाएगा। 12 अप्रैल को राहु मेष में और केतु तला राशि में आ जाएगा। चंद्र पर करीब ढाई दिन में राशि बदल लेता है।

अधिक जानकारी के लिए आप Myjyotish के अनुभवी ज्योतिषियों से बात करें।

इस नवरात्री ज्योतिष के ये उपाय, धन की नहीं होने देंगे कभी कमी 


नवरात्रि में किसी भी दिन अपने घर में आप नागकेसर का पौधा जरूर लगाएं। ये ऐसा पौधा है जो देवी लक्ष्मी को बहुत आकर्षित करता है। देवी इस पौधे के लगते ही आपके घर में आ जाएंगी और आपको धन पाने के नए रास्ते मिलेंगे।

यदि धन आते ही चला जाता है तो नवरात्रि पर गुलर के दो फल लेकर आएं और देवी के चरणों में इसे रख कर फिर अपनी तिजोरी में लाल कपड़े में लपेट कर रख दें। धन आने का जरिया बना रहेगा।

नवरात्र के दौरान घर में मोर पंख लाकर उसे मंदिर में स्थापित करने से कई फायदे होते हैं। मोर पंख को भगवान का अंश माना जाता है। मां लक्ष्मी की एक सवारी में से मोर भी होता है। नवरात्र में मोर पंख घर में लाने से आपके घर में मां लक्ष्मी का वास होता है और सुख समृद्धि भी बढ़ती है।

नवरात्रि में 9 सफेद कौड़ियों को लाल रूमाल या लाल कपड़े में बांधकर घर की तिजोरी में रखने से धन में वृद्धि होती है। नवरात्री में नवमी के दिन किसी निर्धन बालिका को वस्त्र और उपहार देकर आशीर्वाद लें।

यदि आपके बनते काम बिगड़ जाते हैं तो आपको नवरात्रि की नवमी को लोहे के पात्र में जल भरे और इसमें चीनी, दूध और घी मिला कर पीपल के की जड़ में चढ़ना चाहिए। इससे आपकी समस्या दूर हो जाएगी।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन।

नवरात्र में किसी पूराने अशोक वृक्ष की जड़ का पूजन करने से मांदुर्गा की कृपा से धन-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। नवरात्रि में पीपल के पेड़ पर सफेद रंग की ध्वजा चढ़ाने से आकास्मिक धन की प्राप्ति का योग बनता है।

नवरात्रि की अष्टमी पर देवी दुर्गा को कमल का फूल चढ़ाएं और फिर इसे लाल वस्त्र में लपेट कर उनके चरणों में रखें। इसके बाद इस पर सिंदूर लगा कर उसे अपनी तिजोरी में रख दें। धन की आपको कभी कमी नहीं होगी।

दुर्गाष्टमी के दिन श्री यंत्र की स्थापना करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। नवरात्रि में किसी भी दिन प्रातःकाल गाय को गन्ना या गुड़ खिलाने से जीवन की समस्याएं दूर हो जाती हैं। नवरात्रि के मौके पर नौ कन्याओं को भोजन कराने और उन्हें श्रृंगार के साथ उपहार देने से धन की कमी दूर होती है।

यदि नौकरी चली गई है या नौकरी मिल नहीं रही तो नवरात्रि में रोज पीपल के पेड़ की जड़ में कच्चा दूध चढ़ाएं। साथ ही शाम के समय देवी मां के सामने घी का दीपक जलाएं। ये उपाय आपकी समस्या दूर कर देगा।

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जानें नवरात्रि उपवास के नियम


नवरात्रि उपवास नियम भारत में एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न हो सकते हैं या समुदाय से समुदाय में भिन्न हो सकते हैं। एकादशी, जन्माष्टमी, गौरी व्रत और महा शिवरात्रि व्रत के दौरान समान उपवास नियम लागू होते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों के उपवास के दौरान नवरात्रि व्रत के सभी नियमों का पालन करना कठिन होता है क्योंकि लोगों को यह याद रखना होता है कि उन्हें कोई भी अनावश्यक चीजें नहीं खानी चाहिए, जो उपवास में वर्जित होती हैं। यह लोगों के लिए कठिन समय हो सकता है लेकिन भक्त 9 दिनों तक उपवास रखते हैं और देवी के प्रति दृढ़ संकल्प, भक्ति और समर्पण दिखाते हैं। 

नवरात्रि व्रत साधना प्राप्ति के साथ-साथ नौ देवी को प्रसन्न करने के लिए उनका आशीर्वाद पाने में बहुत सहायक होता है। कुछ लोग केवल एक ही समय में फल खाते हैं, आमतौर पर इसे फलाहारी कहा जाता है और शाम को वे नवरात्रि व्रत का भोजन करते हैं, जबकि कुछ भक्त केवल 9 दिन पूरे होने तक केवल एक बार खाते हैं तो कुछ सिर्फ फल या दुध का ही सेवन करते हैं। जो लोग नवरात्रि व्रत की प्रक्रिया और सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करते हैं, उन भक्तों से माता प्रसन्न होती हैं। माँ दुर्गा ने उन्हें शक्ति, बुद्धि, धन और सुख का आशीर्वाद प्रदान करती है।  

नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 
गलती से भी घर में न होने दे कलह

नवरात्रि के समय घर में जहां पूजा पाठ का माहौल होता है, वहीं लोग व्रत भी रखते है. ऐसे में गलती से भी ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए,
जिससे घर में कलह की स्थिति उत्पन हो.
जिससे व्रत रखने और पूजा पाठ करने वालों के मन को दुख न पहुंचे.

लहसुन प्याज का सेवन न करें

नवरात्रि के पावन दिनों में आचार-विचार के साथ ही आहार भी शुद्ध और सात्विकता रखे.
नौ दिन यदि व्रत नहीं है तो भी कोशिश करे की लहसुन प्याज इत्यादि का सेवन न करें.

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद

इस मंत्र का जप करें


ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:  का जाप करें.

शैलपुत्री नवजात शिशु की स्थिति को संबोधित करती है, जो निर्दोष और शुद्ध है. देवी शैलपुत्री मूल रूप से महादेव की पत्नी पार्वती हैं. देवी पार्वती अपने पिछले जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं और उस जन्म में भी वह महादेव की पत्नी थीं. सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में महादेव का अपमान सहन करने में असमर्थ होकर योग अग्नि में खुद को भस्म कर दिया. इसके बाद उन्होंने हिम राजा हिमवान के घर में पार्वती के रूप में अवतार लिया. पर्वतराज हिमालय के घर कन्या के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा.

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घर खाली न छोड़ें

यदि आपने अपने घर में नवरात्रि में कलश स्थापना कर अंखड ज्योति जलाई है तो घर को सूना न छोड़ें. 
घर में कोई न कोई सदस्य अवश्य रहना चाहिए. नवरात्रि के दौरान घर के सूना छोड़ना अशुभ माना जाता है. 
इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए.


ब्रह्मचर्य का पालन करें

नवरात्रि के 9 दिन साधना कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति जगाने के लिए होते हैं. 
इन 9 दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन सिर्फ तन से ही नहीं बल्कि मन से भी करना चाहिए. 
किसी भी तरह का कामुक विचार मन में न लाएं और महिलाओं से दूरी बनाकर रहें. 
नवरात्रि में भूलकर भी किसी महिला का अपमान न करें.

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नवरात्री के प्रथम दिन से लेकर अष्टमी तक पूरी लिस्ट देखें 


नवरात्रि का दिन 1- 2 अप्रैल- घटस्थापना, शैलपुत्री पूजा

नवरात्रि का दिन 2- 3 अप्रैल- ब्रह्मचारिणी पूजा

नवरात्रि का दिन 3- 4 अप्रैल- चन्द्रघन्टा पूजा

नवरात्रि का दिन 4- 5 अप्रैल- कुष्माण्डा पूजा

नवरात्रि का दिन 5- 6 अप्रैल- स्कन्दमाता पूजा

नवरात्रि का दिन 6- 7 अप्रैल- कात्यायनी पूजा

नवरात्रि का दिन 7- 8 अप्रैल- कालरात्रि पूजा

नवरात्रि का दिन 8- 9 अप्रैल- दुर्गा अष्टमी, महागौरी पूजा

नवरात्रि का दिन 9- 10 अप्रैल- महानवमी, सिद्धिदात्री पूजा

नवरात्रि का दिन 10- 11 अप्रैल- नवरात्रि व्रत पारण

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन।

नवरात्रि में पहने ये 9 विशेष रंग के वस्त्र 


देवी शैलपुत्री

देवी मां के इस स्वरूप को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए इस दिन पीला रंग पहनना शुभ माना जाता है।

देवी ब्रह्मचारिणी

देवी ब्रह्मचारिणी को हरा रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए नवरात्रि के दूसरे दिन हरे रंग का वस्त्र धारण करें।

देवी चंद्रघंटा

देवी चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए नवरात्रि के तीसरे दिन हल्का भूरा रंग पहनें।

देवी कूष्माण्डा

देवी कूष्मांडा को संतरी रंग प्रिय है। इसलिए नवरात्रि के चौथे दिन संतरी रंग के कपड़े पहनें।


नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 

देवी कूष्माण्डा

देवी कूष्मांडा को संतरी रंग प्रिय है। इसलिए नवरात्रि के चौथे दिन संतरी रंग के कपड़े पहनें।

देवी स्कंदमाता

देवी स्कंदमाता को सफेद रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए नवरात्रि के पांचवे दिन सफेद रंग के वस्त्र पहनें।

देवी कात्यायनी

देवी मां के इस स्वरूप को लाल रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए इस दिन मां की पूजा करते समय लाल रंग का वस्त्र पहनें।

देवी कालरात्रि

भगवती मां के इस स्वरूप को नीला रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए नवरात्रि के सातवें दिन नीले रंग के वस्त्र पहनकर मां की पूजा-अर्चना की जानी चाहिए।

देवी महागौरी

देवी महागौरी की पूजा करते समय गुलाबी रंग पहनना शुभ माना जाता है। अष्टमी की पूजा और कन्या भोज करवाते इसी रंग को पहनें।


दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद

इस नवरात्री अपने अंदर की शक्ति को जगाएं।


धन एक शक्ति है, इसीलिए धनवान अकसर बिगड़ जाते हैं, उनमें अहंकार आ जाता है। शरीर का बल भी एक शक्ति है, जिसके पास पैसा नहीं, वह मार-पिटाई करके अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश करता है। विद्या भी एक शक्ति है, जो ज्यादा पढ़-लिख जाए, उसका दिमाग भी कई बार खराब हो जाता है। अभिमान मतलब राक्षस। चाहे तुम बहुत सुंदर हो, फिर भी अपने स्वभाव से राक्षस हो सकते हो। अभिमान, ईर्ष्या, क्रोध, वैमनस्य राक्षस बना देता है।

महिषासुर कौन है? तुम्हारा अवचेतन मन ही महिषासुर है। इस अवचेतन मन में सारे पाप-पुण्य हैं। महिष मतलब भय। वह असुर, जो महिष जैसा दिखता है। अज्ञान काले रंग का प्रतीक है। ज्ञान श्वेत, उज्ज्वलता का प्रतीक है। अज्ञान, हमारी आसक्ति, हमारे पाप ये सब महिषासुर ही तो हैं। इस महिषासुर को आदत है प्रताड़ित करने की। तुम्हें दुख कौन देता है? तुम्हारा भय। तुम्हारी वासनाएं तुम्हें दुख देती हैं। तुम्हारी आसक्तियां, तुम्हारा ममत्व तुम्हें दुख देता है। इसका नाश कैसे हो? इसलिए देवी उत्पन्न करनी पड़ेगी। इसी देवी को तंत्र में कुंडलिनी कहा।

वह शक्ति, जिसके द्वारा आप अपने अवचेतन मन में पड़े हुए इस महिषासुर नामी राक्षस को मार सकते हो, उसको उत्पन्न करना पड़ता है। सबको अपने अंदर इस देवी को जगाना पड़ता है। देवी को जगाने की साधना करनी होती है। जब वह जगती हैं, फिर तुम्हारे इस अवचेतन मन में पड़े हुए अंधकार और भयरूपी महिषासुर को मारती है। जो शक्ति अभी सुप्त है, वह हमसे दूर है। जब वह शक्ति जाग्रत होती है, तब चक्रों का भेदन होता है। जिस व्यक्ति का स्वाधिष्ठान चक्र खुल  गया, ऐसे व्यक्ति को कामवासना कभी छू नहीं सकती।


अधिक जानकारी के लिए आप Myjyotish के अनुभवी ज्योतिषियों से बात करें।

इस नवरात्री बन रहे हैं गृह नक्षत्रों के दुर्लभ संयोग 


चैत्र मास हिंदू नववर्ष का पहला महीना होता है. इस महीने की प्रतिपदा तिथि से नवमी तिथि तक मां दुर्गा की उपासना की जाती है, इस साल चैत्र नवरात्रि 02 अप्रैल, शनिवार से आरंभ हो रही हैं.

इस तरह रहेगी नवरात्र में ग्रहों की स्थिति-

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस वर्ष चैत्र नवरात्र में ग्रह नक्षत्रों के संयोग से दुर्लभ योग बनने जा रहे है। ग्रहों की स्थिति की बात की जाये तो मकर राशि में मंगल व शनि एक साथ विराजमान रहेंगे। शनि-मंगल के इस युति योग से पराक्रम में वृद्धि होगी. साथ ही कार्यों में सफलता और मनोकामना पूर्ति के भी योग बनेंगे. इसके अतिरिक्त चैत्र नवरात्रि की अवधि में कुंभ राशि में गुरु और शुक्र की युति योग बन रहा है. साथ ही साथ मेष राशि में चंद्रमा, वृषभ राशि में राहु, वृश्चिक में केतु और मीन राशि में सूर्य और बुध विराजमान रहेंगे. 

इस तरह से बनेंगे नवरात्र में शुभ योग-

स्थानीय पञ्चाङ्ग अनुसार देखा जाये तब नवरात्रि के दौरान रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि पुष्य नक्षत्र के शुभ संयोग बन रहे हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सर्वार्थ सिद्धि योग का संबंध मां लक्ष्मी से है. मान्यता है कि इस योग में किए गए कोई भी कार्य शुभ परिणाम देते हैं. साथ ही कार्यों में सफलता भी मिलती है. साथ ही रवियोग में सभी प्रकार के दोषों से मुक्ति मिलती है. माना जाता है कि इस योग में किए गए कर्य शीघ्र परिणाम देते हैं. 

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नवरात्र के दौरान बनेंगे शुभ संयोग-


03 अप्रैल द्वितीय तिथि - सर्वार्थ सिद्धि योग
04 अप्रैल तृतीय तिथि - रवियोग
05 अप्रैल चतुर्थी तिथि - सवार्थ सिद्ध व रवियोग
06 अप्रैल पंचमी तिथि - रवियोग व सवार्थ सिद्धि योग
07 अप्रैल षष्ठी तिथि - रवियोग
08 अप्रैल सप्तमी तिथि - सवार्थ सिद्धि योग
09 अप्रैल अष्टमी तिथि - रवियोग
10 अप्रैल राम नवमी - रवियोग व रविपुष्य योग 

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सवार्थ सिद्धि योग- इस बीच किया गया कोई भी जाप, अनुष्ठान आपको कई गुणा फल प्रदान करता है. किसी विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य भी सफल होता है. इस योग को परम फलदायी माना जाता है. इस योग में मकान की खरीददारी, वाहन की खरीददारी, सोने चांदी के जेवरात की खरीददारी, मुंडन, गृहप्रवेश आदि शुभ कार्यों के लिए ये योग अत्यंत शुभ माना गया है.

रवियोग- इस योग में सभी अशुभता को नष्ट करने की क्षमता है. इसमें किया गया कार्य शीघ्र फलीभूत होता है. रवि योग के दौरान अगर सूर्य उपासना की जाए, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ और सूर्य मंत्रों का जाप किया जाए तो इसका विशेष लाभ मिलता है. आपके जीवन से तमाम समस्याओं का अंत होता है. इस बीच अगर कोई विशेष अनुष्ठान किया जाए तो वो सफल होता है.

रविपुष्य योग- रवि पुष्य योग को महायोग भी कहा जाता है. ये रविवार के संयोग से मिलकर बनता है. 10 अप्रैल को राम नवमी के दिन ये विशेष योग बनेगा. इस योग में यदि कोई नया कार्य किया जाए, बिजनेस की शुरुआत की जाए, तो वो कार्य अवश्य सफल होता है. अगर आपकी कुंडली में सूर्य दोष है तो रवि पुष्य योग में सूर्य उपासना करने से काफी लाभ मिलता है.

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राशि अनुसार भोग व मंत्र जप-

मेष- मालपुए का भोग लगाएं, ॐ दुं दुर्गाय नम: का जाप करें। 

वृषभ- रबड़ी का भोग लगाएं और ॐ गौरी नम: का जाप करें।

मिथुन- पपीते का भोग लगाएं और ॐ धात्री नम: का जाप करें।

कर्क- दूध का भोग लगाएं और ॐ जया नम: का जाप करें।

सिंह- अनार का भोग लगाएं और ॐ मंगलाकाली नम: का जाप करें।

कन्या- खीर का भोग लगाएं और ॐ विजया नम: का जाप करें।

जन्मकुंडली ज्योतिषीय क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है

तुला- सिंघाड़े का भोग लगाएं और ॐ लक्ष्मीभ्यो नम: का जाप करें।

वृश्चिक- गुड़ की वस्तु का भोग लगाएं और ॐ शिवाय नमः का जाप करें।

धनु- पान का बीड़ा चढ़ाएं और ॐ गजननाये नम: का जाप करें। 

मकर- नारियल भेंट रखें और ॐ मेधायै नम: का जाप करें।

कुंभ- हलवा के भोग लगाएं और ॐ स्वधायै नम: का जाप करें।

मीन- पंचमेवे का भोग लगाएं और ॐ पद्मायै नम: का जाप करें।

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद
विजय प्राप्ति हेतु भगवान श्री राम ने भी की थी दुर्गा पूजा 

पुराणों के अनुसार, देवी दुर्गा की पूजा मुख्य रूप से नवरात्रि के समय पर विशेष रुप से फलदायी होती है. दुर्गा पूजन का संबंध भगवान श्री राम से भी संबंधित रहा है जिसे रम की शक्ति पूजा भी कहा गया है. दुर्गा पूजन द्वारा श्री राम का अकालबोधन सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत प्रथा बन गया. रामायण कथा अनुसार श्री राम अपनी अपहृत पत्नी सीता को लंका में राक्षसों के राजा रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए लंका जाते हैं. रावण के साथ अपनी लड़ाई शुरू करने से पहले, राम देवी दुर्गा का आशीर्वाद चाहते थे. अपनी विजय की कामना हेतु वह देवी का आहवान करते हैं  और मात औनकी परिक्षा लेती हैं जिनमें वह अपने नेत्र को माता को अर्पित करने के लिए तत्पर होते हैं तत क्षण देवी उनसे प्रसन्न हो कर उनके समक्ष प्रस्तुत होती हैं ओर उन्हें विजय का आशीर्वाद प्रदान करती हैं.

अपार धन प्राप्ति के लिए नवरात्रि में ऐसे करें धन की देवी लक्ष्मी की पूजा। 
जानें मां चंद्रघंटा के स्वरूप  के बारे में-

मां का यह रूप बहुत शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का एक अर्धचंद्र होता है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला और आकर्षित होता है। माँ चंद्रघंटा के दस हाथ हैं। मां चंद्रघंटा के दस भुजाएं और दसों हाथों में खड्ग, बाण सुशोभित हैं। इन्हें शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। माता चन्द्रघंटा देवी का शरीर शरीर सोने की तरह चमकता हुआ प्रतीत होता है। ऐसी मान्यता है कि माता के घंटे की तेज व भयानक ध्वनि से दानव, और अत्याचारी राक्षस सभी बहुत डरते है । देवी चंद्रघंटा अपने भक्तों को अलौकिक सुख देने वाली है। माता चंद्रघंटा का वाहन सिंह है। यह हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहने वाली मुद्रा में होती है। मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला रहती है।

इस नवरात्रि विंध्याचल में कराएं दुर्गा सहस्त्रनाम का पाठ पाएं अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य 

माँ चंद्रघंटा को इस मंत्र से करें प्रसन्न 


माता चंद्रघंटा अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। माना गया है की जो भी भक्त नवरात्री के तीसरे दिन माँ दुर्गा के इस स्वरुप की पूजा अर्चना करते हैं, उन सभी को सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। नवरात्री उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन माँ चंद्रघंटा के विग्रह की पूजा-आराधना की जाती है। माँ चंद्रघंटा को जो भी भक्त पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से याद करते हैं, देवी उनके सभी दुख-दर्द हर लेती हैं। 

नवरात्री के पावन अवसर पर माँ चंद्रघंटा की कृपा पाने के लिए, इस मंत्र का जाप करें एवं माता के तीसरे स्वरुप को प्रसन्न करें। 

माँ चंद्रघंटा के मंत्र  

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

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मां चंद्रघंटा की पूजा विधि

  • सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानादि करने के पश्चात पूजा स्थान पर गंगाजल छिड़कें।
  • अब मां चंद्रघंटा का ध्यान करें और उनके समक्ष दीपक प्रज्वलित करें।
  • अब माता रानी को अक्षत, सिंदूर, पुष्प आदि चीजें अर्पित करें।
  • इसके बाद मां को प्रसाद के रूप में फल और मखाने की खीर अर्पित करें।
  • अब मां चंद्रघंटा की आरती करें।
  • पूजा के पश्चात क्षमा याचना करें।


देवी मां को लगाएं इसका भोग

मां चंद्रघंटा को दूध और उससे बनी चीजों का भोग लगाएं और और इसी का दान भी करें। ऐसा करने से मां प्रसन्न होती हैं और सभी दुखों का नाश करती हैं। भोग के रूप में यदि मां चंद्रघंटा को मखाने की खीर का भोग लगाया जाए तो यह उत्तम रहेगा। 

अधिक जानकारी के लिए आप Myjyotish के अनुभवी ज्योतिषियों से बात करें।

माँ चंद्रघंटा की आरती  


नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा का ध्यान।
मस्तक पर है अर्ध चंद्र, मंद मंद मुस्कान।।

दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखे खडग संग बांद।
घंटे के शब्द से हरती दुष्ट के प्राण।।

सिंह वाहिनी दुर्गा का चमके स्वर्ण शरीर।
करती विपदा शांति हरे भक्त की पीर।।

मधुर वाणी को बोल कर सबको देती ज्ञान।
भव सागर में फंसा हूं मैं, करो मेरा कल्याण।।

नवरात्रों की मां, कृपा कर दो मां।
जय मां चंद्रघंटा, जय मां चंद्रघंटा।।


नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 

शेरावाली माता का तृतीय स्वरूप 


पौराणिक कथाओं के अनुसार जब असुरों का आतंक बढ़ गया था तब उन्हें सबक सिखाने के लिए मां दुर्गा ने अपने तीसरे स्वरूप में अवतार लिया था। दैत्यों का राजा महिषासुर राजा इंद्र का सिंहासन हड़पना चाहता था। राक्षस यही चाहते थे कि देवी-देवताओं को पराजित कर हम उनके ऊपर राज करें। जिसके लिए दैत्यों की सेना और देवताओं के बीच में युद्ध छिड़ गया था। महिषासुर स्वर्ग लोक पर अपना राज कायम करना चाहता था जिस कारण सभी देवता परेशान थे। उन्हें डर था कि उनका राज्य न छिन जाए, इस वजह से सभी देवता अपनी परेशानी लेकर त्रिदेवों के पास गए। त्रिदेव सभी देवताओं  की बात सुनकर क्रोधित हुए और उन्होंने एक हल निकाला। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के मुख से ऊर्जा उत्पन्न हुई जिसने देवी का रूप ले लिया।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 
नवरात्रि के चौथे दिन बन रहा ये शुभ योग-

नवरात्रि के चौथे दिन यानी 5 अपप्रैल को सुबह 8 बजे तक प्रीति योग रहेगा। इसके बाद आयुष्मान योग शुरू होगा। शास्त्रों के अनुसार, प्रीति व आयुष्मान योग को शुभ योगों में गिना जाता है। इन योगों में किए गए कार्यों में सफलता प्राप्त होने की मान्यता है।
नवरात्रि के चौथे दिन का शुभ रंग- 

नवरात्रि के चौथे दिन हरा रंग पहनना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि मां कूष्मांडा को हरा रंग अतिप्रिय है।

मां कूष्मांडा का भोग-

मां कूष्मांडा को भोग में मालपुआ चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि इस भोग को लगाने से मां कूष्मांडा प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपना आशीर्वाद बनाए रखती हैं।

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मां कूष्मांडा पूजा विधि-

सबसे पहले स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
इसके बाद मां कूष्मांडा का ध्यान कर उनको धूप, गंध, अक्षत्, लाल पुष्प, सफेद कुम्हड़ा, फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान अर्पित करें।
इसके बाद मां कूष्मांडा को हलवे और दही का भोग लगाएं। आप फिर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकते हैं।
मां का अधिक से अधिक ध्यान करें।
पूजा के अंत में मां की आरती करें। 

देवी कूष्मांडा मंत्र- 

या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

आज ही करें बात देश के जानें - माने ज्योतिषियों से और पाएं अपनीहर परेशानी का हल 
नवरात्रि के चौथे दिन के शुभ मुहूर्त-

ब्रह्म मुहूर्त-  04:35 AM से 05:21 PM
अभिजित मुहूर्त- 11:59 AM से 12:49 PM
विजय मुहूर्त-  02:30 PM से 03:20 PM
गोधूलि मुहूर्त- 06:29 PM से 06:53 PM
अमृत काल-  02:14 AM से 03:59 PM
सर्वार्थ सिद्धि योग-  06:07 AM से 04:52 PM
रवि योग-  06:07 AM से 04:52 PM

अष्टमी पर माता वैष्णों को चढ़ाएं भेंट, प्रसाद पूरी होगी हर मुराद 
नवरात्रि के चौथे दिन बन रहा ये शुभ योग-

नवरात्रि के चौथे दिन यानी 5 अपप्रैल को सुबह 8 बजे तक प्रीति योग रहेगा। इसके बाद आयुष्मान योग शुरू होगा। शास्त्रों के अनुसार, प्रीति व आयुष्मान योग को शुभ योगों में गिना जाता है। इन योगों में किए गए कार्यों में सफलता प्राप्त होने की मान्यता है।

मां कूष्मांडा का स्वरूप-

मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं। मां को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में जपमाला है। मां सिंह का सवारी करती हैं।

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मां कूष्मांडा की व्रत कथा


दुर्गा का चौथा स्वरूप कूष्मांडा मां का है। इनकी आठ भुजाएं हैं. कमंडल, धनुष बाण, चक्र, गदा, अमृतपूर्ण कलश, कमल पुष्प, सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। पौराणिक मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था तब माता ने ब्रह्मांड की रचना कर सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति बन गई थीं। यह केवल एक मात्र ऐसी माता है जो सूर्यमंडल के भीतर के लोक में निवास करती हैं। इनकी पूजा करके व्यक्ति अपने कष्टों और पापों को दूर कर सकता है। तभी से ये मान्यता है कि आठ भुजाओं वाली कूष्मांडा मां भक्तों के सारे दुख और कष्टों का नाश करती हैं। भक्त इस दिन व्रत के साथ-साथ मां की आराधना करते हैं। 

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देवी कूष्मांडा क्यों कहलायी जाती हैं अष्टभुजा। 

कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हे अष्टभुजा भी कहते हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं इसलिए इस देवी को कुष्मांडा। इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है।

अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इससे भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। ये देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।

अपार धन प्राप्ति के लिए नवरात्रि में ऐसे करें धन की देवी लक्ष्मी की पूजा। 
कैसे देवी का नाम पड़ा कुष्मांडा?

कुष्मांडा का अर्थ होता है कुम्हड़ा। मां दुर्गा असुरों के अत्याचार से संसार को मुक्त करने के लिए कुष्मांडा अवतार में प्रकट हुईं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन्हीं ने पूरे ब्रह्माण्ड की रचना की है। ऐसी मान्यता है कि पूजा के दौरान उनकी कुम्हड़े की बलि दी जाए तो वे प्रसन्न होती हैं।
ब्रह्माण्ड और कुम्हड़े से उनका जुड़ाव होने कारण वे कुष्मांडा के नाम से विख्यात हैं।

स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद

देवी कूष्मांडा की महिमा…

देवीभागवत पुराण के अनुसार नवरात्रि के चौथे दिन देवी के चौथे स्वरूप माता कूष्मांडा की पूजा करनी चाहिए। माता का यह स्वरूप देवी पार्वती के विवाह के बाद से लेकर संतान कुमार कार्तिकेय की प्राप्ति के बीच का है। इस रूप में देवी संपूर्ण सृष्टि को धारण करने वाली और उनका पालन करने वाली हैं। संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को देवी के इस स्वरूप की पूजा आराधना करनी चाहिए। 

जन्मकुंडली ज्योतिषीय क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है

देवी कूष्मांडा की पूजा से मिलता है ये वरदान…

देवी कूष्मांडा की आराधना करने से आराधकों के सभी रोग-शोकों का नाश हो जाता है। इसके अलावा मां की कृपा से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य समृद्धि आती है। जो लोग अक्सर बीमार रहते हैं उन्हें देवी कूष्मांडा की पूजा श्रद्धा भाव सहित करना चाहिए।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

आयु, यश, बल का मिलता है आशीर्वाद:

साथ ही मां कूष्मांडा के शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं। मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं।इनका वाहन सिंह है। नवरात्र -पूजन के चौथे दिन कूष्मांडा देवी के स्वरुप की ही उपासना की जाती है। इस दिन मां कूष्मांडा की उपासना से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।

नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 

मां कूष्मांडा की हैं 8 भुजाएं:

भगवती दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्मांडा है। अपनी मंद हंसी द्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था। चारों ओर अंधकार ही अंधकार परिव्याप्त था। तब इन्हीं देवी ने अपने ईषत् हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। अत: यही सृष्टि की आदि-स्वरूपा आदि शक्ति हैं। इनकी आठ भुजाएं हैं। इनके सात हाथों में क्रमश: कमण्डल, धनुष बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहां निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है।

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आज करें ये खास उपाय

धन सम्बन्धी परेशानी के लिए-  हो सके तो ललिता सहस्स्रनाम का पाठ जरूर करे.
इसे मां लक्ष्मी की कृपा मिलेगी और दरिद्रता का अंत होगा.
स्वास्थ्य के लिए- भगवती को नवरात्र के चोथे दिन पेठे का दान करना  चाहिए.
मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है.

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लगाएं मालपुए का भोग

मां कुष्मांडा का जन्म दैत्यों का संहार करने के लिए हुआ था. कुष्मांडा का अर्थ कुम्हड़ा होता है. कुम्हड़े को कुष्मांड कहा जाता है इसीलिए मां दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कुष्मांडा रखा गया था. देवी का वाहन सिंह है. जो भक्त नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की विधिवत तरीके से पूजा करता है उससे बल, यश, आयु और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है. मां कुष्मांडा को लगाए गए भोग को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करती हैं. यह कहा जाता है कि मां कुष्मांडा को मालपुए बहुत प्रिय हैं इसीलिए नवरात्रि के चौथे दिन उन्हें मालपुए का भोग लगाया जाता है.

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माँ स्कंदमाता का स्वरुप 


स्कंद का अर्थ है कुमार कार्तिकेय अर्थात माता पार्वती और भगवान शिव के जेष्ठ पुत्र कार्तिकय, जो भगवान स्कंद कुमार की माता हैं, वही हैं मां स्कंदमाता। स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं जिनमें से माता ने अपने दो हाथों में कमल का फूल पकड़ा हुआ है। उनकी एक भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है जिससे वह भक्तों को आशीर्वाद देती हैं और एक हाथ से उन्होंने गोद में बैठे अपने पुत्र स्कंद को पकड़ा हुआ है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है और सिंह इनका वाहन है।

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स्कन्दमाता की पूजा से होती है सभी इच्छाएं पूरी

देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। देवी स्कंदमाता का वर्ण पूर्णत: शुभ्र है अर्थात मिश्रित है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी होती है, इसके साथ ही मां स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं।


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हर कठिनाई दूर करती हैं मां

शास्त्रों में मां स्कंदमाता की आराधना का काफी महत्व बताया गया है। इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष मिलता है, सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाता है। ऐस में मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले साधक या भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है। इसके अलावा स्कंदमाता की कृपा से संतान के इच्छुक दंपत्ति को संतान सुख प्राप्त हो सकता है।

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मां स्कंदमाता की पूजन विधि और भोग

नवरात्रि के पवित्र दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की अलग-अलग दिन पूजा-अर्चना की जाती है. हर दिन मां के अलग स्वरूप को समर्पित होता है. नवरात्रि को शुरू हुए चार दिन हो चुके हैं और आज मां की भक्ति का पांचवा दिन है. नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा का विधान है. मां स्कंदमाता को मां दुर्गा का मातृत्व परिभाषित करने वाला स्वरूप माना जाता है.

प्रात: काल उठकर स्नान आदि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें. पूजा के स्थान पर स्कंदमाता की मूर्ति स्थापित कर पूजन आरंभ करें. सर्वप्रथम मां की प्रतिमा को गंगाजल से शुद्ध करें और मां के सम्मुख पुष्प अर्पित करें. मिष्ठान और 5 प्रकार के फलों का भोग लगाएं. साथ ही 6 इलायची भी भोग में अर्पित करें. कलश में पानी भरकर उसमें कुछ सिक्के डाल दें और इसके बाद पूजा का संकल्प लें. मां को रोली-कुमकुम का तिलक लगाएं और पूजा के बाद मां की आरती उतारें और मंत्र जाप करें. 

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नवरात्रि के पांचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा ऐसे करें। 
  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद, साफ कपड़े पहन लें।
  • गंगाजल से मां की मूर्ति को स्नान कराएं। 
  • स्नान के बाद फूलों की पेशकश करें।
  • एक पान में सुपारी,बताशा, लौंग इलायची,  रखकर स्कंद माता तो अर्पित करें। 
  • स्कंद माता को रोली  व  कुमकुम।
  • स्कंद माता को फल में केला और पांच प्रकार की मिठाई माता को चढ़ाए ,इसके बाद जल अर्पित करें। 
  • स्कंदमाता को फल व मिठाई अर्पित करने बाद माता के सामने घी का दीपक व धूप जलाए और माता के मंत्र का जप करें। 
  • माँ स्कंदमाता की ज्यादा से ज्यादा देखभाल करें। 
  • स्कंद माता की आरती अवश्य करें। 
अपार धन प्राप्ति के लिए नवरात्रि में ऐसे करें धन की देवी लक्ष्मी की पूजा। 

इस नवरात्री स्कंदमाता हरेंगी सभी समस्याएं 


बधु संबंधित समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। 

यदि आपका व्यवसाय अच्छी तरह से काम नहीं कर रहा है, तो आप अपनी उम्मीद अनुसार व्यवसाय में लाभ नहीं प्राप्त कर सकते, इसके लिए आज आपको स्कंदमाता को धन्यवाद और अपने कार्यालय में स्थापित करना होगा।

यदि आप अपनी बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको अपनी सोचने और समझने की ताकत को बढ़ाना होगा, जिसके लिए आज आपको 4 मुखी रुद्राक्ष को देवी मां के चरणों में रखना होगा और विधि विधान  से पूजाकरनी होगी। पूजा करने के बाद माता के चरणों में अर्पित 4 मुखी रुद्राक्ष को गले में धारण करने से आपकी सभ समस्याएं हल होजाएंगी। 

नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 

नवरात्रि का पांचवां दिन- शुभ मुहूर्त-


ब्रह्म मुहूर्त- 04:34 AM से 05:20 AM
विजय मुहूर्त- 02:30 PM से 03:20 PM
गोधूलि मुहूर्त- 06:29 PM से 06:53 PM
अमृत काल- 04:06PM से 05:53 PM
सर्वार्थ सिद्धि योग- पूरे दिन    
रवि योग- 07:40 PM से 06:05 AM, अप्रैल 07

मां का भोग-

मां को केले का भोग अति प्रिय है। मां को खीर का प्रसाद भी अर्पित करना शुभ होता है। मान्यता है कि ऐसा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। मां को विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। मां की उपासना से अलौकिक तेज की प्राप्ति होती है।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 
मां कात्यायनी पूजा विधि 

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं और फिर साफ- स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें।
मां की प्रतिमा को शुद्ध जल या गंगाजल से स्नान कराएं। 
मां को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें।
मां को स्नान कराने के बाद पुष्प अर्पित करें।
मां को रोली कुमकुम लगाएं। 
मां को पांच प्रकार के फल और मिष्ठान का भोग लगाएं।
मां कात्यायनी को शहद का भोग अवश्य लगाएं।
मां कात्यायनी का अधिक से अधिक ध्यान करें।
मां की आरती भी करें।
जानें मां कात्यायनी की पूजा का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां कात्यायनी की पूजा- अर्चना करने से विवाह में आ रही परेशानियां दूर हो जाती हैं।
मां कात्यायनी की पूजा करने से कुंडली में बृहस्पति मजबूत होता है।
मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाने से सुंदर रूप की प्राप्ति होती है।
मां कात्यायनी की विधि- विधान से पूजा- अर्चना करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
शत्रुओं का भय समाप्त हो जाता है। 
मां कात्यायनी की कृपा से स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से भी छुटकारा मिल जाता है।

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नवरात्री के छठे दिन कौन से हैं शुभ मुहूर्त 

ब्रह्म मुहूर्त- 04:34 AM  से 05:20 AM
अभिजित मुहूर्त- कोई नहीं
विजय मुहूर्त- 02:30 PM से 03:20 PM
गोधूलि मुहूर्त- 06:29 PM से 06:53 PM
अमृत काल- 04:06 PM से 05:53 PM
निशिता मुहूर्त- 12:00 AM, अप्रैल 07 से 12:46 AM, अप्रैल 07
सर्वार्थ सिद्धि योग- पूरे दिन

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद
मां कात्यायनी स्तुति मंत्र


या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

मां कात्यायनी का ध्यान मंत्र


वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

मां कात्यायनी स्त्रोत

कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहारूपिणी॥


मां कात्यायनी कवच मंत्र

कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥

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माँ कात्यायनी की पौराणिक कथा 


पौराराणिक कथा के अनुसार वनमीकथ का नाम के महर्षि थे, उनका एक पुत्र था जिसका नाम कात्य रखा गया। इसके बाद कात्य गोत्र में महर्षि कात्यायन ने जन्म लिया, उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने मां भगवती को पुत्री के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की, महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उन्हें साक्षात दर्शन दिया। कात्यायन ऋषि ने माता को अपनी मंशा बताई, देवी भगवती ने वचन दिया कि वह उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेंगी।

जब तीनों लोक पर महिषासुर नामक दैत्य का अत्याचार बढ़ गया और देवी देवता उसके कृत्य से परेशान हो गए, तब ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव के तेज से माता ने महर्षि कात्यायन के घर जन्म लिया। इसलिए माता के इस स्वरूप को कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। माता के जन्म के बाद कात्यायन ऋषि ने सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिनों तक मां कात्यायनी की विधिवत पूजा अर्चना की। इसके बाद मां कात्यायनी ने दशमी के दिन महिषासुर नामक दैत्य का वध कर तीनों लोक को उसके अत्याचार से बचाया।

नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 

जानें आज षष्ठी तिथि के अवसर पर बेल के वृक्ष का महत्व



आज षष्ठी तिथि में शाम के समय व्रती को बेल के पेड़ के पास जाकर देवी मां का बोधन करना चाहिए, अर्थात् उन्हें जगाना चाहिए और कहना चाहिए- “रावण के नाश के लिये एवं राम पर अनुग्रह करने के लिये ब्रह्मा ने तुम्हें अकाल में जगाया, अतः मैं भी तुम्हें चैत्र की षष्ठी की संध्या में जगा रहा हूं।

इस प्रकार दुर्गा के बोधन के बाद बेल वृक्ष से कहें- ''हे बेल वृक्ष, तुमने श्रीशैल पर जन्म लिया है और तुम लक्ष्मी के निवास हो, तुम्हें ले चलना है। चलो, तुम्हारी पूजा दुर्गा के समान करनी है।'' इसके बाद बेल के पेड़ पर थोड़ी मिट्टी, इत्र, पत्थर, 7 अनाज, दूर्वा, फल, फूल, दही और घी चढ़ाने के बाद सिंदूर से स्वास्तिक बनाना चाहिए और उसे दुर्गा के निवास के योग्य बनाना चाहिए।

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद

गोपियों ने की थी मां कात्यायनी की पूजा

माना जाता है कि- भगवान श्री कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने कालिन्दी यमुना के तट पर मां कात्यायनी की ही पूजा की थी । इसलिए देवी मां को ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी पूजा जाता है । साथ ही आपको बता दूं कि- ग्रहों में इनका आधिपत्य बृहस्पति ग्रह, यानी गुरु पर रहता है और आज गुरुवार का दिन भी है। लिहाजा गुरु संबंधी परेशानियों से छुटकारा पाने के लिये भी आज मां कात्यायनी की पूजा करना आपके लिये विशेष हितकारी होगा।

कन्या के विवाह में आ रही परेशानियों को हरेंगी मां कात्यायनी

अगर आपकी कन्या के विवाह में किसी प्रकार की परेशानी आ रही है तो आज मां कात्यायनी के इस मंत्र का जप करें। मंत्र है- 

‘ऊँ क्लीं कात्यायनी महामाया महायोगिन्य घीश्वरी,
नन्द गोप सुतं देवि पतिं मे कुरुते नमः।।’


आज इस मंत्र का 11 बार जाप करने से आपकी कन्या के विवाह में आ रही परेशानी जल्द ही दूर होगी।

अष्टमी पर माता वैष्णों को चढ़ाएं भेंट, प्रसाद पूरी होगी हर मुराद 

मां कालरात्रि पूजा विधि

मां कालरात्रि की पूजा सुबह के समय करना शुभ माना जाता है। मां की पूजा के लिए लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए। मकर और कुंभ राशि के जातको को कालरात्रि की पूजा जरूर करनी चाहिए। परेशानी में हो तो सात या नौ नींबू की माला देवी को चढ़ाएं। सप्तमी की रात्रि तिल या सरसों के तेल की अखंड ज्योति जलाएं। सिद्धकुंजिका स्तोत्र, अर्गला स्तोत्रम, काली चालीसा, काली पुराण का पाठ करना चाहिए। यथासंभव इस रात्रि संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।


मां कालरात्रि को भोग

सप्तमी नवरात्रि पर मां को खुश करने के लिए गुड़ या गुड़ से बने व्यंजनों का भोग लगा सकते हैं। 

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

मां कालरात्रि दूर करेंगी सभी परेशानियां

यदि आपको भी किसी चीज़ का भय बना रहता है तो आज मां कालरात्रि का ध्यान करके उनके इस मंत्र का जप अवश्य ही करें। 

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्ति हारिणि।
जय सार्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥


यदि आपके जीवन में भी पैसों का आभाव बना रहता है या आप अपनी आर्थिक स्थिति और बेहतर बनाना चाहते हैं, तो आज के दिन मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाएं, उनके इस मंत्र को  216 बार जाप करें। 

ॐ यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमाऽऽपदः ॐ।।


नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 

मां कालरात्रि का वाहन गधा है, मां की 4 भुजाएं हैं।


आज चैत्र शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि और शुक्रवार का दिन है। सप्तमी तिथि आज रात 11 बजकर 5 मिनट तक रहेगी। उसके बाद अष्टमी तिथि लग जाएगी। आज नवरात्र का सातवां दिन है । नवरात्र के दौरान पड़ने वाली सप्तमी को महासप्तमी के नाम से जाना जाता है । आज मां दुर्गा के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा की जायेगी । जब माता पार्वती ने शुंभ-निशुंभ का वध करने के लिए अपने स्वर्णिम वर्ण को त्याग दिया था, तब उन्हें कालरात्रि के नाम से जाना गया। मां कालरात्रि का वाहन गधा है और इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से ऊपर का दाहिना हाथ वरद मुद्रा में और नीचे का हाथ अभयमुद्रा में रहता है। जबकि बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड़ग है। 

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद
मां कालरात्रि की आरती। 

कालरात्रि जय-जय-महाकाली।
काल के मुह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।
महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा।
महाकाली है तेरा पसारा॥

खडग खप्पर रखने वाली।
दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा।
सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी।
गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णा।
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥

ना कोई चिंता रहे बीमारी।
ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवें।
महाकाली माँ जिसे बचाबे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह।
कालरात्रि माँ तेरी जय॥

नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 
जानें देवी कालरात्रि की कथा

धर्म ग्रंथों के अनुसार, दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज से जब सभी देवता परेशान हो गए तो वे भगवान शिव के पास पहुंचे। तब शिवजी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध करने के लिए आग्रह किया। भगवान के आग्रह पर देवी पार्वती ने दुर्गा के रूप में अवतार लिया और दैत्यों से युद्ध करने लगी। इसी रूप में देवी ने शुंभ-निशुंभ का वध किया, लेकिन रक्तबीज का रक्त जहां-जहां गिरता, वहां लाखों रक्तबीज पैदा हो जाते। तब देवी दुर्गा ने मां कालरात्रि के रूप में अवतार लिया और रक्तबीज का वध किया। रक्तबीज से शरीर से निकलने वाले रक्त को माता ने पी लिया।

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद
माँ कालरात्रि का ध्यान मंत्र। 

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

अष्टमी पर माता वैष्णों को चढ़ाएं भेंट, प्रसाद पूरी होगी हर मुराद 
मां महागौरी का स्वरूप

इनका ऊपरी दाहिना हाथ अभय मुद्रा में रहता है और निचले हाथ में त्रिशूल है। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू जबकि नीचे वाला हाथ शांत मुद्रा में है।  मां महागौरी का रंग पूर्णता गोरा होने के कारण ही इन्हें महागौरी या श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है । मान्यता है कि मां महागौरी की पूजा करने से धन व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

मां महागौरी का प्रिय पुष्प

मां का प्रिय पुष्प रात की रानी है। इनका राहु ग्रह पर आधिपत्य है, यही कारण है कि राहुदोष से मुक्ति पाने के लिए मां महागौरी की पूजा की जाती है।

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद

आज के शुभ मुहूर्त- 

  • ब्रह्म मुहूर्त- 04:32 ए एम से 05:17 ए एम
  • अभिजित मुहूर्त- 11:58 ए एम से 12:48 पी एम
  • विजय मुहूर्त- 02:30 पी एम से 03:20 पी एम
  • गोधूलि मुहूर्त- 06:31 पी एम से 06:55 पी एम
  • अमृत काल- 01:50 ए एम, अप्रैल 10 से 03:37 ए एम, अप्रैल 10
  • निशिता मुहूर्त- 12:00 पी एम से 12:45 ए एम, अप्रैल 10
  • रवि योग- 04:31 ए एम, अप्रैल 10 से 06:01 ए एम, अप्रैल 10
अष्टमी पर माता वैष्णों को चढ़ाएं भेंट, प्रसाद पूरी होगी हर मुराद 

मां महागौरी पूजा विधि-

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद साफ- स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
मां की प्रतिमा को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं। 
मां को सफेद रंग के वस्त्र अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां को सफेद रंग पसंद है।
मां को स्नान कराने के बाद सफेद पुष्प अर्पित करें।
मां को रोली कुमकुम लगाएं। 
मां को मिष्ठान, पंच मेवा, फल अर्पित करें।
मां महागौरी को काले चने का भोग अवश्य लगाएं।
मां महागौरी का अधिक से अधिक ध्यान करें।
मां की आरती भी करें।
अष्टमी के दिन कन्या पूजन का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन कन्या पूजन भी करें।

अष्टमी पर माता वैष्णों को चढ़ाएं भेंट, प्रसाद पूरी होगी हर मुराद 

चैत्र पक्ष के नवरात्रों की नवमी तिथि को राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु ने राम अवतार में धरती पर जन्म लिया था। भगवान श्रीराम के भक्त इस दिन विधि विधान से पूजा पाठ करते हैं। आज हम आपको बताएंगे कि राम नवमी की पूजा कैसे करें और इस दिन पूजा करने का शुभ मुहूर्त क्या है

चैत्र शुक्ल की नवमी तिथि का आरंभ शनिवार 9 अप्रैल  को रात 1:32 हो जाएगा  और रविवार 10 अप्रैल को रात 3:15 तक रहेंगी।

इस नवरात्रि कराएं कामाख्या बगलामुखी कवच का पाठ व हवन। 

रामनवमी पर बनने वाले शुभ योग। 


इस बार रामनवमी पर तीन शुभ योग एक साथ बन रहे हैं। रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र का संयोग बहुत ही शुभ माना जाता है और रामनवमी के दिन यह संयोग पूरे दिन बना रहेगा। इस योग के साथ साथ रवि योग और सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहे हैं। जिसके चलते रामनवमी के पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है।

रामनवमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:31 से 5:16 तक रहेगा।  अभिजीत मुहूर्त 11:57 से 12:48 मिनट तक रहेगा। बात करे विजय मुहूर्त की तो इस बार रामनवमी पर विजय मुहूर्त दोपहर 2:30 से 3:31 तक रहेगा। गोधूलि मुहूर्त  शाम 6:31 से 6:55 तक रहेगा। आपको बता दें कि रामनवमी के दिन अमृत काल रात 11:50 से लेकर 11 अप्रैल को सुबह 1:35 तक रहेगा। इस दिन रवि पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग पूरे दिन रहेंगे।

अष्टमी पर माता वैष्णों को चढ़ाएं भेंट, प्रसाद पूरी होगी हर मुराद 

जानिए राम नवमी का महत्व


राम नवमी, विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम का जन्मदिन चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन मनाया जाता है। इस दिन मां सिद्धिदात्री की भी पूजा की जाती है। देवी को चार भुजाओं के साथ दर्शाया गया है, गदा, चक्र, शंख और एक कमल का फूल पकड़े हुए, और अपने भक्तों को कई सिद्धियाँ प्रदान करने के लिए कहा जाता है। वह शेर की पीठ पर सवार होती है।

बहुत से लोग या तो अखंड रामायण पाठ करते हैं या सिर्फ सुंदरकांड का जाप करते हैं। अखंड रामायण पाठ करने में तुलसीदास द्वारा संपूर्ण रामचरितमानस का जप करना शामिल है, जिसमें आमतौर पर 24 घंटे लगते हैं। सुंदरकांड का जप करने में तीन घंटे लगते हैं। सुंदरकांड हनुमान के कुछ कारनामों और लंका में सीता के साथ उनकी मुलाकात की चर्चा करता है। मंदिरों में आमतौर पर वाल्मीकि रामायण या बड़े पंडाल कार्यक्रमों का जप होता है जिसमें रामायण की चर्चा नौ दिनों तक की जाती है, उगादी से शुरू होकर राम नवमी पर समाप्त होती है।

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद
रामनवमी पर करें यह उपाए, होंगे भगवान राम प्रसन्न। 

कहते हैं कि यदि भगवान श्रीराम को पाना है तो उनके परम भक्त हनुमान जी को प्रसन्न करना चाहिए। रामनवमी के दिन सुंदरकांड का पाठ करने से भगवान श्रीराम जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं। यदि आप जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा का सामना कर रहे हैं और आप इन बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं तो रामनवमी के दिन भगवान राम का दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक करें। इससे आपकी सभी बाधायें दूर हो जाएंगी।

रामनवमी के दिन सिंदूर लगे हनुमानजी की मूर्ति से सिंदूर लेकर माता सीता के चरणों में लगाएं और उसके बाद माता सीता को अपनी मनोकामना कहकर भक्ति पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाये यह कार्य दिन में तीन बार करना है। सुबह, दोपहर और शाम के समय करना है। इससे जीवन में आ रही सभी प्रकार की बाधायें दूर होंगी और घर में सुख शांति बनी रहेंगी।

दुर्गा के नौ स्वरूप और उन्हें अर्पित किया जाने वाला विशेष प्रसाद
हिंदू धर्म में दान का बहुत महत्व बताया गया इसलिए रामनवमी के दिन आप गरीबों को भोजन करवाएं और संभव हो तो वस्त्र दान करें इससे आपको मंगल फल की प्राप्ति होगी।

भगवान श्री राम और हनुमान दोनों ऐसे देवता हैं जिनकी पूजा एक दूसरे के बिना अधूरी सी रह जाती है। इस रामनवमी रामायण का पाठ करें इससे भगवान राम और राम भक्त हनुमान दोनों ही प्रसन्न होंगे और आपके घर में खुशहाली और धन वैभव की वृद्धि होगी।

यदि आप भगवान श्रीराम को जल्द ही प्रसन्न करना चाहते हैं तो आप रामनवमी के दिन 
श्री राम राम रमेति 
रमे रामे मनोरमे
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं
श्री राम नाम वरानने
मंत्र का जप 108 बार करें। इससे भगवान श्रीराम आपसे जल्द ही प्रसन्न होंगे।

नवरात्रि स्पेशल - 7 दिन, 7 शक्तिपीठ में श्रृंगार पूजा। 

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