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ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व

आचार्य गिरीश राजौरिया Updated 19 Jun 2020 09:54 PM IST
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व - फोटो : Myjyotish
सूर्य समस्त विश्व की आत्मा है इसलिए सूर्य को जगतपतेय ज्योति स्वरूप ईश नारायण का स्वरूप माना गया है वेदों में सूर्य को अग्नि का स्वरूप भी मानते हैं इसीलिए सूर्य में सृजनात्मक  का प्रभाव होने से सृष्टि का क्रम भी सूर्य से चलता है परन्तु सूर्य के अंदर नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा दोनों का ही प्रभाव है सूर्य की शक्ति के बिना जातक सांसारिक जीवन में ओर आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में उन्नति पाना मुश्किल है शास्त्रों के अनुसार जितने भी यज्ञ कर्म होते हैं इसका साक्षी सूर्य होता है सूर्य ही आत्मबल का कारक है । सूर्य से ही जातक काआत्मबल ओर उसकी मानसिकता जीवन के प्रति नजरिया ओर आदर्श ,अनुसासन ,ओर उच्चकोटि का प्रेम एवँ सूर्य से उच्चपद देखा जाता है यदि वैज्ञानिक आधार से देखा जाए तो समस्त ग्रह सूर्य का बल प्राप्त करके अपना शुभ फल देने में सामर्थ्य रखते है। सूर्य की किरणों से चन्द्रमा में शुभत्व प्राप्त होता है जो पूर्णिमा का प्रकाश सूर्य से ही मिलता है चन्द्रमा सूर्य से शक्ति प्राप्त करने पर चन्द्रमा जातक के मन की स्थिरता को दर्शता है जब सूर्य  चन्द्रमा को सकारात्मक प्रभाव देता है तो  माता के उच्चकोटि के संस्कार व सहयोग मिलता है  ।

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मंगल ग्रह के अंदर जोश , साहस ,  पराक्रम ,बल सूर्य से ही प्राप्त करता है सूर्य की ऊर्जा शक्ति प्राप्त करने के बाद मंगल जातक के अंदर कठिनाई व परेशानी का सामना करने की क्षमता प्रदान करता है मंगल का शुभ व अशुभ फल उस जातक की कुंडली में सकारात्मक व नकारात्मक स्थति पर निर्भर करती हैं। सूर्य का प्रकाश बुध को प्राप्त होता है तो बुधात्य योग का निमार्ण करता है जो जातक के मानसिक स्थिरता ,बुद्धि बल ,विद्वत्ता ओर आत्म चेतना की शक्ति सूर्य की देदीप्यमान ऊर्जा से मिलती है ।                                   
गुरु के विषय में कहा जाता है कि सूर्य का गुरु ,गुरु है इसी गुरु ग्रह से जातक को ग्रहस्थ सुख ,समृद्धि ,ज्ञान ओर विवेक का मालूम किया जाता है किंतु गुरु ग्रह को आत्म प्रकाश (प्राण शक्ति) सूर्य से ही मिलती हैं जिससे जातक को धार्मिक एवं शुभ मार्ग पर चलने की शक्ति की प्रेरणा मिलती है ।                                      
शुक्र आंनद ,ऐश्र्वर्य ,धन ,व स्त्री के सुख का कारक शुक्र है पर वह जब तक सूर्य की किरणों से ही देदीप्यमान नही होता तो शुक्र अपना कोई प्रभाव नही है सूर्य जब शुक्र को ऊर्जा का स्त्रोत प्रभावित करता है तभी जातक को संसार के भौतिक सुख का आंनद मिलता है जो स्त्री और पुरूष को संभोग करने की क्षमता  मिलती है।                      
शनि कर्म का कारक है वही कर्म करने के सूर्योदय होना अर्थात दिन का होना जरूरी है वह शक्ति शनि को उसे सूर्य से ही प्राप्त होती हैं  सूर्य से प्राप्त शक्ति शनि  न्याय पूर्वक कर्म करने की क्षमता देता हैसूर्य जब नकारात्मक प्रभाव में राहु केतु के साथ होता है तो जातक के अन्दर आत्मबल में कमी पैदा होती है ऐसा जातक अपने कार्यक्षेत्र में विशेष प्रभाव नही दिखा  पाता है जिसके कारण असंतोष व परेशनी का सामना करना पड़ता है।  यहाँ एक बात विशेष है जब राहु या केतु के साथ सूर्य ग्रहण बनाता है उस समय शनि या मंगल भी युति बना रहे हो उस समय राष्ट्र पर अधिक परेशानी ,महामारी, कष्ट और भय रहता हैं ।
सूर्य प्रेम का विशेष कारक माना गया है जब सूर्य शुभ हो व शुभ ग्रहों से युति हो तो सूर्य उच्चकोटि व अनुशासन का प्रेम देता है यही प्रेम पिता ,पुत्र से बने तो वह पुत्र के साथ उच्चकोटि व अनुशासन
का प्रेम दर्शता है यही प्रेम संस्कार व मर्यादित होकर परिवार व समाज के प्रेरिक होता है जब सूर्य व शुक्र की शुभ युति होने पर यदि यह प्रेम पत्नी से बने तो वह प्रेम आदर्श व सुखमय को दर्शता है ।

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ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को राजा माना गया है इसलिए सूर्य का दायत्व भी अधिक माना जाता है कुंडली के विभिन्न दशा में यह अपना प्रभाव दिखाता है वैसे सूर्य देव प्रकृति ग्रह है किंतु इसे क्रूर ग्रह की श्रेणी में रखा गया है जब यह जातक की कुंडली मे अशुभ प्रभाव में आने या पीड़ित होने पर यह व्यक्ति विशेष को समस्याओ में भी डाल देता है ।
सूर्य विभिन्न ग्रहों से मिलकर विशेष योगों का निर्माण करता है :-
1.सूर्य जब गुरु से युति करता है तो एक राजा और मंत्री की युति मानी जाती है सूर्य ,गुरु की शुभ युति गजकेसरी योग का निमार्ण करता है यह योग राजयोग है ऐसा योग सांसारिक सुख ,आध्यात्मिक सुख के साथ साथ जातक को उच्च व्यक्तित्व भी प्रदान करता है ।
2. सूर्य बुध से युति होने पर कुंडली में बुधआदित्य राजयोग का निर्माण करता है इस योग में जातक शिक्षक, प्रवक्ता , प्रवचन कर्ता जैसा गुणों का संचार करता है सरकारी सेवाएं, विशेष राजयोग प्रदान करता है ।
3. सूर्य चन्द्र की युति इस योग में सूर्य पिता और चन्द्र माता की युति आ जाएं तो व्यक्ति विशेष के मन और मस्तिष्क में विशेष सामंजस्य होता है व्यक्ति उच्च विचारों वाला सौम्य प्रव्रत्ति वाला होता किंतु चन्द्रमा क्षीण होने के कारण मनोबल हीन ओर डरपोक होता है ।
4. सूर्य मंगल की युति  राजा और सेनापति की युति ये दर्शाता है कि जातक पराक्रमी , अपने मेहनत व बल से सभी सुख को पाने वाला होता है ।
 
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5.सूर्य और शुक्र की युति जातक को कला संगीत व सुख सुविधा को पाने वाला होता है ।
6. सूर्य और शनि की युति जातक को  बहुत संघर्ष करने के बाद शुभ फल मिलता है ।
7. राहु केतु से जब सुर्य की युति होती हैं सूर्यग्रहण एक अशुभ योग बनता है । जिसमे जातक के शुभ प्रभावों में कमी आ जाती है इस युति की वजह से जातक उलझनों में ओर समस्याओ से घिरा रहता है किसी भी प्रकार के कार्य करने पर उसे अनेक बाधाओ का सामना करना पड़ता है उसे कार्य का पूरा होने का श्रेय भी नहीं मिलता है ।

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