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शनि जयंती 2020 : जानिए शनि का कोकिलावन धाम क्यों कहलाया महिमाकारी ?

MyJyotish Expert Updated 20 May 2020 06:46 PM IST
Shani Jayanti 2020: Know why Shani's Kokilavan Dham is called glorious?
शनि देव सूर्य पुत्र है एवं इनकी माता का नाम छाया है। शनि जयंती का शुभ पर्व इस वर्ष शुक्रवार 22 मई 2020 को मनाया जाएगा। शनि देव का आशीर्वाद प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है। उनकी आराधना बहुत सावधानी के साथ की जानी चाहिए अन्यथा उनके दुष्परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए। शनि का क्रोध तो सम्पूर्ण जगत में विख्यात है परन्तु उनकी कल्याणकारी महत्वता का भोग बहुत कम लोग ही चख पाएं है। शनि मृत्यु देवता यमराज के भाई है। उन्हें नवग्रहों में सर्व श्रेष्ठ माना जाता है। वह पितृ शत्रु के रूप में भी जाने गए है। एक बार तो उन्हें अपनी कुशलता का इस प्रकार घमंड हो गया था की स्वयं कृष्ण कन्हैया ने उनके अंहकार को चूर करने की नियति रच दी थी। शनि जयंती के शुभ अवसर पर कोकिलावन शनि धाम में चढ़ाएं 11 किलों तेल और पाएं अष्टम शनि ,शनि की ढैय्या एवं साढ़े - साती के प्रकोप से छुटकारा : 22-मई-2020

कृष्ण की लीलाओं का बोध तो सभी को है। परन्तु इस बार जो लीला उन्होंने रची थी वह शनि देव के अहंकार पर बहुत भारी पड़ गई थी। पुराणों में बहुत सी गाथाएं है जिसमें स्वयं नर नारायण भगवान विष्णु ने धरती पर विभिन्न रूपों में अधर्म का नाशकर धर्म की स्थापना के लिए अवतार लिए है। इन्ही में से द्वापर युग में उनका एक मुख्य अवतार लीलाधर श्री कृष्ण का भी था। कथन अनुसार श्री कृष्ण का रूप बालावस्था में इतना मन - मोहक था की सभी देवता विभिन्न रूप धरकर बारी - बारी से श्री कृष्ण के दर्शन के लिए धरती लोक पर पधार रहे थे। सभी चाहतें थे की शीग्र - अतिशिग्र उन्हें कृष्ण के उस सुन्दर रूप के दर्शन हो जाएं। परन्तु सभी के धरती पर आने का एक अर्थ था जो धीरे - धीरे समाज में पहुंचना आवश्यक था।

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शनि देव को अपनी शक्ति और पराक्रम पर बहुत अहंकार हो गया था। जिसके कारण वह कृष्ण को देखने के लिए इतने उत्सुक हो गए की अपनी बारी की प्रतीक्षा किए बिना ही धरती पर आने का निश्चय कर लिया। श्री कृष्ण तो अंतर्यामी थे , उन्होंने शनि की इस योजना को भाप लिया और इसे विफलकर शनि के अहंकार को चूर करने के लिए हनुमान जी की सहायता ली। शनि जब धरती पर आए तो कोकिलावन में उनका सामना हनुमान जी से हुआ। कृष्ण दर्शन में विग्न डालने वालें को परास्त करने के लिए शनि ने पूर्ण शक्ति का उपयोग किया अर्थात शनि और हनुमान जी में भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में लड़ते - लड़ते शनि को यह एहसास हो गया की हनुमान कोई साधारण वानर नहीं है। स्वयं को पराजित होता महसूस कर शनि देव का अहंकार चूर -चूर होने लगा।

शनि जयंती के पावन अवसर पर कोकिलावन शनि धाम में कराएं तेल अभिषेक

शनि ने अंत में आकर हनुमान को अपना स्वरुप प्रकाशित करने को आग्रह किया। तब हनुमान जी ने उन्हें सारी कथा बताई और उन्हें अपना असल स्वरुप दिखाया। यह सब जानकर शनि ने श्री कृष्ण के दर्शन का समय जानने की इच्छा व्यक्त की। जिसका उत्तर देते हुए हनुमान ने उन्हें सही समय आने तक वही प्रतीक्षा करने को कहा। आज भी शनि देव की पूजा से पहले वहां स्थित हनुमान मंदिर में हाज़िरी लगाना आवश्यक होता है। कृष्ण ने इसी स्थान पर शनिदेव को दर्शन दिए थे। शनि के प्रकोप और दुष्प्रभावों से बचने के लिए इस मंदिर में तेल से अभिषेक करना बहुत लाभदायक माना जाता है।

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