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Naga Sadhu: 12 सालों के कठोर तप के बाद बनते हैं नागा साधु, जानें क्या है पूरी प्रक्रिया

सुप्रिया कंडवालसुप्रिया कंडवालUpdated 09 Jan 2025 12:10 PM IST
Naga Sadhu: 12 सालों के कठोर तप के बाद बनते हैं नागा साधु, जानें क्या है पूरी प्रक्रिया

Special Things

Naga Sadhu: नागा साधु बनने की प्रक्रिया बेहद ही कठिन होती है। नागा साधु बनने में 12 साल का समय लग जाता है और इस दौरान बेहद ही कठिन प्रक्रिया से इन्हें गुजरना होता है।

Naga Sadhu: नागा साधुओं की दुनिया बेहद रहस्यमयी मानी जाती है और साथ ही वे हिंदू धर्म में सबसे आकर्षक व्यक्तित्वों में से एक माने जाते हैं। नागा साधुओं की एक विशेषता यह है कि वे कपड़े नहीं पहनते। कड़कड़ाती ठंड में भी वे नग्न अवस्था में रहते हैं और अपने शरीर पर भस्म या धुनी लगाकर घूमते हैं। "नागा" का अर्थ होता है नग्न, और ये संन्यासी अपना जीवन बिना कपड़े पहने बिताते हैं।  इसके अलावा नागा साधु स्वयं को भगवान का संदेशवाहक मानते हैं।


नागा साधु बनने की प्रक्रिया (Kaise Bante hai Naga Sadhu)


नागा साधु बनने की प्रक्रिया बहुत कठिन और लंबी होती है। इन साधुओं को अखाड़ों द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है, और हर अखाड़े की अपनी मान्यता और परंपराएं होती हैं, जिनके आधार पर उन्हें दीक्षा दी जाती है। कई अखाड़ों में इन्हें "भुट्टो" भी कहा जाता है। जब वे अखाड़े में शामिल होते हैं, तो उन्हें गुरु की सेवा करनी होती है और कई अन्य छोटे कार्यों को भी करना होता है। नागा साधु बनने की प्रक्रिया में लगभग 12 साल का समय लगता है। पहले 6 साल खास होते हैं, इस दौरान व्यक्ति को जरूरी ज्ञान की प्राप्ति करनी होती है और उन्हें केवल लंगोट में रहना होता है। कुंभ मेले के दौरान वे एक प्रण लेते हैं, जिसके बाद वे अपना लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर बिना कपड़े पहने रहने का संकल्प करते हैं।
नागा साधु बनने की शुरुआत ब्रह्मचर्य की शिक्षा से होती है। जब यह शिक्षा सफलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है, तब उन्हें महापुरुष दीक्षा दी जाती है। इसके बाद यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इस प्रक्रिया के बाद वे अपने परिवार का पिंडदान करते हैं, जिसमें 16 पिंडदान अपने परिजनों का और 17वां खुद का पिंडदान होता है। इसके बाद वे स्वयं को मृत घोषित कर देते हैं और अपने पूर्व जन्म की सभी निशानियां मिटा दी जाती हैं। ऐसा करने के बाद नागा साधु जनेऊ, गोत्र, और अपनी पूर्व पहचान से पूरी तरह मुक्ति पा लेते हैं।


कैसा होता है नागा साधु का जीवन (Naga Sadhu ka Jeevan)


नागा साधुओं के लिए सांसारिक जीवन का कोई महत्व नहीं होता। वे अपने समुदाय को ही अपना परिवार मानते हैं और साधारण झोपड़ी में रहते हैं। इनका कोई निश्चित घर नहीं होता। नागा साधु बिस्तर पर नहीं सोते और दीक्षा शुरू होते समय ही जीवन के सभी भौतिक सुखों को त्याग देते हैं। उनका जीवन बहुत सादा और कठोर होता है। उन्हें एक दिन में केवल सात घरों से भिक्षा लेने की अनुमति होती है। यदि इन घरों से उन्हें भोजन नहीं मिलता, तो वे भूखे रहते हैं। इसके अलावा वे दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं।
नागा साधु हमेशा नग्न अवस्था में रहते हैं और युद्ध कला में पारंगत होते हैं। वे विभिन्न अखाड़ों में रहते हैं, और जूना अखाड़ा नागा साधुओं का प्रमुख केंद्र है। नागा संन्यासियों की परंपरा का प्रारंभ 8वीं शताब्दी में हुआ था, जब सनातन धर्म के मंदिरों और मान्यताओं को नष्ट किया जा रहा था। यह देखकर आदि गुरु शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की और सनातन धर्म की रक्षा का दायित्व लिया। उन्होंने महसूस किया कि धर्म की रक्षा के लिए शास्त्र के साथ-साथ शस्त्रों की भी आवश्यकता है, और तब उन्होंने अखाड़ा परंपरा की शुरुआत की। इन अखाड़ों में धर्म की रक्षा के लिए मर-मिटने वाले साधुओं को प्रशिक्षण दिया जाता था, और नागा साधु इन्हीं अखाड़ों के धर्म रक्षक माने जाते हैं।

नागा साधुओं को दी जाती है भू-समाधि (Naga Sadhu Bhu Samadhi)


नागा साधुओं के पास रहस्यमयी शक्तियां होती हैं, जिन्हें वे कठोर तपस्या और साधना के माध्यम से प्राप्त करते हैं। हालांकि, वे इन शक्तियों का उपयोग कभी भी गलत उद्देश्य के लिए नहीं करते। उनका उद्देश्य केवल दूसरों की समस्याओं को हल करना होता है। हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसके शव को जलाने की परंपरा है, लेकिन नागा साधुओं के शवों को जलाया नहीं जाता। उनके शव को सिद्ध योग मुद्रा में बिठा कर भू-समाधि दी जाती है।

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