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Shree Ghrshneshvar Jyotirling Mandir : इस मंदिर के दर्शन से पूरी होती है संतान सुख की कामना

Myjyotish Expert Updated 08 Aug 2022 12:56 PM IST
इस मंदिर के दर्शन से पूरी होती है संतान सुख की कामना
इस मंदिर के दर्शन से पूरी होती है संतान सुख की कामना - फोटो : google

 इस मंदिर के दर्शन से पूरी होती है संतान सुख की कामना 


भगवान शिव को समर्पित ग्रिशनेश्वर मंदिर भारत के सबसे पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है. यह एक प्राचीन मंदिर है जिसका उल्लेख हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों में से एक शिव पुराण में मिलता है. माना जाता है कि मंदिर, जिसे 13 वीं शताब्दी में बनाया गया था, मुगलों के शासनकाल के दौरान बार-बार नष्ट कर दिया गया था और फिर से बनाया गया था, और 18 वीं शताब्दी में अपने वर्तमान स्वरूप में इसका पुनर्निर्माण किया गया था. आज, मंदिर एक विश्व विख्यात धार्मिक स्थल के रूप में प्रतिष्ठित है. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को फूलों और रुद्राक्ष की पवित्र मालाओं से सजाया जाता है.

घृष्णेश्वर मंदिर का क्या महत्व है?

मंदिर का महत्व यह भी है कि घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से सभी 12 ज्योतिर्लिंगों की पूजा करने का लाभ मिल सकता है. यह भी कहा जाता है कि यहां दर्शन करने से निसंतान लोगों को संतान सुख की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सुख सौभाग्य का आगमन होता है. 

शिव पुराण के अनुसार, इस प्राचीन पूजा स्थल से कई किंवदंतियाँ जुड़ी हुई हैं:

शिवालय की कथा
शिवालय की कथा में कहा गया है कि अपने शिकार के दौरान, वेरुल के राजा ने ऋषियों के आश्रम में रहने वाले जानवरों को मार डाला. इससे ऋषि क्रोधित हो गए जिन्होंने राजा को श्राप दिया और उसकी देह पर कीड़े-मकोड़े लग गए. राजा श्राप के कारण जंगल में भटकता रहा जहां उसने इस स्थान पर बहने वाले पानी का सेवन किया जैसे ही उसने पानी पीना शुरू किया, उसके शरीर से कीड़े चमत्कारिक रूप से गायब हो गए. उस स्थान पर अभिभूत राजा ने घोर तपस्या की. तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान ब्रह्मा ने राजा को आशीर्वाद दिया और एक झील बनाई जिसे शिवालय के नाम से जाना जाने लगा.

कुमकुमेश्वर की कथा
भगवान शिव और उनकी पत्नी पार्वती शिवालय के पास सह्याद्रि श्रेणी में निवास कर रहे थे. एक दिन, जब देवी सिंदूर लगाने वाली थीं, तो उन्होंने उसे शिवालय के जल में मिला दिया. तब सिंदूर प्रकाश की एक उज्ज्वल किरण उत्सर्जित करते हुए एक लिंग में बदल गया. यह लिंग सिंदूर से निकला था, इसलिए इस ज्योतिर्लिंग को शुरू में कुमकुमेश्वर कहा जाता था. लेकिन देवी ने इसका नाम घृष्णेश्वर रखा.

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घुश्मेश्वर की कथा
एक ब्राह्मण विद्वान, ब्रह्मवेत्ता सुधारम और उनकी पत्नी, सुदेहा, देवगिरी के दक्षिणी पर्वत में रहते थे. वे निःसंतान थे, और एक व्यथित सुदेहा ने अपनी बहन घुश्मा को सुधारम से शादी करने के लिए राजी किया ताकि वे संतान का सुख प्राप्त कर सकें. आखिरकार, घुश्मा और सुधारम को एक बेटा हुआ किंतु सुदेहा को इस से ईर्ष्या होने लगी. लड़का बड़ा होकर एक सुंदर युवक बना और उसका विवाह कर दिया गया. लेकिन ईर्ष्या की भावनाओं से लिप्त सुदेहा ने सोते समय लड़के को मार डाला और शव को एक झील में फेंक दिया.

संतान की मृत्यु के दुख में भी घुष्मा अपनी भक्ति में लगी रही वह सरोवर में जा कर नियमित रुप से सौ लिंग बना कर पूजा करती थी. उस दिन उसने अपने बेटे को झील से निकलते हुए देखा. तब भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए और कहा कि सुदेहा ने उनके पुत्र का वध किया है. घुश्मा की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने उसका पुत्र वापस कर दिया और उसे वरदान भी दिया. तब घुश्मा ने भगवान से अपनी बहन को क्षमा करने और उसी स्थान पर रहने का अनुरोध किया. भगवान ने उसके अनुरोध को स्वीकार कर लिया और वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करना जारी रखा. इसलिए, उन्होंने घुश्मा के सम्मान में घुश्मेश्वर या घृष्णेश्वर नाम से पुकारा जाने लगा. 

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