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Success Mantra: क्रोध को इंसान का सबसे बड़ा शत्रु क्यों कहा गया है?

Myjyotish Expert Updated 26 Aug 2022 12:23 PM IST
क्रोध को इंसान का सबसे बड़ा शत्रु क्यों कहा गया है?
क्रोध को इंसान का सबसे बड़ा शत्रु क्यों कहा गया है? - फोटो : google

क्रोध को इंसान का सबसे बड़ा शत्रु क्यों कहा गया है?


जीवन में क्रोध और आंधी दोनों एक समान माने गए हैं, क्योंकि दोनों के शांत होने के बाद ही इंसान को पता चलता है कि आखिर नुकसान कितना हुआ है. कभी-कभी नुकसान की भरपाई की जा सकती है परंतु कुछ मामलों में इंसान ऐसे नुकसान कर देते हैं जिनके भरपाई कभी भी नहीं की जा सकती और फिर पछताने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता. जानें आखिर इंसान को क्रोध करने से क्यों बचना चाहिएl

जीवन में व्यक्ति को कभी न कभी किसी न किसी बात को लेकर क्रोध जरूर आता है। कई बार किसी बात या व्यक्ति को लेकर उत्पन्न हुआ क्रोध तुरंत आकर तुरंत ही समाप्त हो जाता है लेकिन कई बार यह लंबे समय तक कुछ लोगों के भीतर कायम रहता है। कभी-कभी इंसान छोटी-छोटी बातों पर भी क्रोध करने लग जाता है अर्थात क्रोध करना उसकी आदत बन जाती है .क्रोध के बारे में हमारे धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि यह तमाम तरह की समस्याओं का कारण होता है, जिसके आने पर सबसे पहले व्यक्ति का धर्म और विवेक नष्ट होता है। शास्त्रों में जिसे इंसान का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है, उस क्रोध को करने से पहले उस बड़ी बला से होने वाले बड़े नुकसान को आइए विस्तार से जानते हैं।

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गलती और क्रोध एक दूसरे के पूरक है क्योंकि गलती करने से गुस्सा आता है और गुस्सा होने पर गलतियां होती है। इंसान को यह प्रयास करना चाहिए कि वह कोई भी गलती जानबूझकर ना करें जिसकी वजह से उसे खुद या फिर किसी और को क्रोध झेलना पड़ेl

क्रोध को पाले रखना बिल्कुल वैसे ही है जैसे किसी गर्म कोयले को दूसरे पर फेंकने की नीयत से अपने हाथ में पकड़े रहना। कहने का तात्पर्य यह कि क्रोध में इंसान खुद ही जलता है। क्रोध, क्रोधित व्यक्ति पर शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से गलत प्रभाव डालता हैl

जिस प्रकार माचिस की तीली दूसरों को जलाने से पहले खुद जलती है, इसी प्रकार क्रोध पहले आपको बर्बाद करता है फिर दूसरों को। कभी-कभी इंसान को यह पता होता है कि वह बेमतलब में क्रोध कर रहा है परंतु फिर भी वह उस पर कोई काबू नहीं पा पाताl

जीवन में किसी के प्रति क्रोध रखने की बजाय उसे तत्काल प्रकट कर देना ज्यादा अच्छा होता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे देर तक सुलगने की बजाय तुरंत जल जाना बेहतर होता है।

अगर आप सही है तो आपको क्रोध करने की बिल्कुल जरूरत ही नही है और यदि आप गलत है तो फिर आपको गुस्सा होने का कोई हक नहीं है।

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