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Jitiya Vrat 2022 : कब और किस कामना के लिए रखा जाता है जितिया व्रत, जानें पूजा विधि और महत्व

Myjyotish Expert Updated 15 Sep 2022 10:14 AM IST
Jitiya Vrat 2022 : कब और किस कामना के लिए रखा जाता है जितिया व्रत, जानें पूजा विधि और महत्व
Jitiya Vrat 2022 : कब और किस कामना के लिए रखा जाता है जितिया व्रत, जानें पूजा विधि और महत्व - फोटो : google

Jitiya Vrat 2022 : कब और किस कामना के लिए रखा जाता है जितिया व्रत, जानें पूजा विधि और महत्व


संतान की दीर्घायु जीवन की कामना के लिए माताएं जितिया व्रत का अनुष्ठान करती है। इस दिन ये दिनभर निर्जला उपवास रखती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका का व्रत रखा जाता है। इसे जीवित्पुत्रिका, जितिया या जिउतिया व्रत के भी नाम से जाना जाता है।

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इस साल जिउतिया व्रत 18 सितंबर दिन रविवार को पड़ेगा। इस व्रत को मुख्य रूप से भारत में बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश तथा नेपाल में मनाया जाता है। जिस जितिया व्रत का नाम गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन के नाम पर रखा गया है। आइए इस व्रत की पूजा की विधि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व आदि के बारे में विस्तार से जानते हैं।

जितिया व्रत का शुभ मुहूर्त

ऐसा बताया जा रहा है की इस साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 17 सितंबर 2022 को दोपहर 2 : 14 मिनट से लेकर 18 सितंबर 2022 को सायंकाल 4 : 32 मिनट तक रहेगी। चूंकि सनातन परंपरा में प्रत्येक पर्व उदया तिथि में मनाया जाता है, ऐसे में जितिया व्रत इस साल 18 सितंबर 2022 को ही मनाया जाएगा और इसका पारण 19 सितंंबर को किया जाएगा।

जितिया व्रत की पूजा विधि

जितिया व्रत माताओं के लिए बहुत कठिन व्रत होता है। इस व्रत में माताओं को दिन भर निराजल उपवास रखना होता है यहां तक की वो शाम के बाद भी कुछ नहीं खा सकती है वो अगले ही दिन पारण समय पर ही करेंगी। इस व्रत की पूजा तीन दिनों में संपन्न होती है।

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व्रत की शुरुआत आश्विन मास के कृष्णपक्ष की सप्तमी वाले दिन नहाय खाए से शुरू होती है। इस दिन महिला सूर्यास्त के बाद कुछ भी नहीं खाती हैं। इसके बाद अष्टमी के दिन विधि-विधान से निर्जला व्रत रखने के बाद नवमी तिथि वाले दिन व्रत का पारण किया जाता है। 

जितिया व्रत का धार्मिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत के समय में अश्वत्थामा ने अपना बदला  पूरा करने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चें को मारने की कोशिश की। अश्वत्थामा ने जब ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को नष्ट कर दिया तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को फिर से जीवित कर दिया।

 जिस भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के बच्चे को गर्भ में जीवित किया, वह दिन आश्विन मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी थी। तब से संतान की लंबी आयु की कामना लिए जीवित्पुत्रिका रखा जाने लगा। मान्यता है कि जो महिलाएं इस व्रत को पूरे विधि-विधान से रखती हैं, उनके बच्चों पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा बरसती है। इस व्रत को रखने से संतान की आयु बढ़ती है और निरोगी और सुखी जीवन जीता है।

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