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Devbhoomi ki Holi: कुमाऊं की होली की अपनी सांस्कृतिक विशेषता

Myjyotish Expert Updated 14 Mar 2022 04:37 PM IST
देवभूमि की होली : कुमाऊं की होली की अपनी सांस्कृतिक विशेषता
देवभूमि की होली : कुमाऊं की होली की अपनी सांस्कृतिक विशेषता - फोटो : google

देवभूमि की होली : कुमाऊं की होली की अपनी सांस्कृतिक विशेषता


बरसाने की होली पूरे देश में प्रसिद्ध है। पर क्या आप जानते है कुमाऊं की होली भी काफी खास है।अपने आप मे कुमाऊं की सांस्कृतिक विशेषताएं समेटे हुए है। जिसके चलते कुमाऊं की होली भी लोगो की बीच काफी प्रसिद्ध है। कुमाऊँ की होली ना केवल उत्तरांचल मे मनाई जाती है। बल्कि पूरे भारत मे जहाँ जहाँ भी कुमाऊंनी लोग बहुतायत संख्या मे है वहा सभी जगह कुमाऊंनी होली मनाई जाती है। उत्तराखंड के कुमाऊँ में रामलीला की तरह फ़ाग का त्योहार होली भी अपने आप अलग ढंग से मनाया जाता है। कुमाऊं में होली की चार विधाएं हैं – खड़ी होली, बैठकी होली, महिलाओं के होली, ठेठर और स्वांग। 

पटांगण (गांव के मुख्या के आंगन) मे अर्थ शास्त्रीय परंपरा के गीतों के साथ मनाई जाती है खड़ी होली। इस होली मे एक मुख्य होलियार होता है जो कि होली गाता है और बाकी होलियार उसके पीछे पीछे उसे दोहराते है। सभी लोग एक बड़े घेरे में बैठे रहते है और साथ साथ ढोल और नंगाड़े का संगीत दिया जाता है। इसी घेरे में कदमो को मिलाकर नृत्य भी करते है। यह होली एक अलग और स्थानीय शैली में मनाई जाती है। इसमें दिए जाने वाले संगीत की धुन हर गांव के अनुसार बदलती रहती है। यह कह सकते है की यह होली गांव की संस्कृति का प्रतीक है।

होली पर वृंदावन बिहारी जी को चढ़ाएं गुजिया और गुलाल - 18 मार्च 2022

इस होली का आरंभ आँवला एकादशी के दिन होता है।इस दिन प्रधान के आंगन और मंदिर में चीर बंधन होता है। उसके बाद छोटी होली वाले दिन गांव मे चीर दहन होता है। फिर अगले दिन छलड़ी और पानी की होली खेली जाती है। छलड़ी उत्तराखंड में गीले रंगों के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला शब्द है। इसी के साथ होली की परंपरा सम्पन्न होती है।

स्थानीय लोग बताते है जो लोक गीत होली के दौरान बजाये जाते है अथवा जो वाद्य यंत्र धुन के लिए इस्तेमाल होते है। इन सभी की शिक्षा पीड़ी दर पीड़ी अपने बच्चो को देते रहते है।
जो मुख्य होलियार होते है वह इस दिन के लिए पूरे वर्ष संगीत लिखते है और उन्हें अपने पास संभाल कर रखते है। ताकि अगली पीड़ी को यह धरोहर दी जा सके।

कुमाऊं मे महिलाये भी अलग ढंग से होली बनाती है। होली के दिन महिलाये बैठकी का आयोजन करती है।इसमें होली का गायन शास्त्रीय संगीत की धुन पर किया जाता है। 
जहां कही भी कुमाऊंनी लोग काफी संख्या मे रहते वहां पर सभी लोग एक साथ मिलकर पूरे पारंपरिक तरीके से होली मनाते है।

वैसे तो पूरे भारत में होली की शुरुवात बसंत के आगमन से हो जाती है। लेकिन कुमाऊँ मे इसकी भी एक अलग परंपरा है। वहां पर होली की शुरुवात वसंत के गीतों से होती फिर प्रथम पूजनीय गणेश जी की वंदना की जाती है उसके बाद सभी देवी देवताओं की वंदना की जाती है। साथ ही उन पर आधारित होली गीत भी गाये जाते है।
जैसे कि वसंत के लिए `आयो नवल बसन्त सखी ऋतुराज कहायो, पुष्प कली सब फूलन लागी, फूल ही फूल सुहायो´ ठीक इसी प्रकार अलग अलग राग में अलग अलग गीत गाये जाते है। यह सिलसिला होली तक चलता है। होली वाले दिन होली गाई जाती है। जिसके लिए अलग अलग राग मे सुर छेड़े जाते है और सभी इसका आनंद लेते है। 

होली पर वृंदावन बिहारी जी को चढ़ाएं गुजिया और गुलाल - 18 मार्च 2022

अब बात करते है चीर व निशान बंधन की तो कुमाऊँ मे इसकी भी अलग मान्यता व परंपरा है। होलिकाष्टमी के दिन ही कुमाऊं में कहीं कहीं मन्दिरों में `चीर बंधन´ का प्रचलन है। पर अधिकांशतया गांवों, शहरों में सार्वजनिक स्थानों में एकादशी को मुहूर्त देखकर चीर बंधन किया जाता है।

इसके लिए गांव के प्रत्येक घर से एक एक नऐ कपड़े के रंग बिरंगे टुकड़े `चीर´ के रूप में लंबे लटठे पर बांधे जाते हैं। इस अवसर पर `कैलै बांधी चीर हो रघुनन्दन राजा…सिद्धि को दाता गणपति बांधी चीर हो…´ जैसी होलियां गाई जाती हैं। इस होली में गणपति के साथ सभी देवताओं के नाम लिऐ जाते हैं।
कुमाऊं में `चीर' को ले जाने का भी प्रचलन है। गांव में चीर को दूसरे गांव वालों की पहुंच से बचाने के लिए दिन रात पहरा दिया जाता है। चीर चोरी चले जाने पर अगली होली से गांव की चीर बांधने की परंपरा समाप्त हो जाती है। कुछ गांवों में चीर की जगह लाल रंग के झण्डे `निशान´ का भी प्रचलन है, जो यहां की शादियों में प्रयोग होने वाले लाल सफेद `निशानों´ की तरह कुमाऊं में प्राचीन समय में रही राजशाही की निशानी माना जाता है।
बताते हैं कि कुछ गांवों को तत्कालीन राजाओं से यह `निशान´ मिले हैं, वह ही परंपरागत रूप से होलियों में `निशान´ का प्रयोग करते हैं। सभी घरों में होली गायन के पश्चात घर के सबसे सयाने सदस्य से शुरू कर सबसे छोटे पुरुष सदस्य का नाम लेकर `जीवें लाख बरीस…हो हो होलक रे…´ कह आशीष देने की भी यहां अनूठी परंपरा है।

भारत मे त्योहारों से जुड़ी यही सभी परंपरा उस पर्व का महत्व और बढ़ा देती है। साथ ही अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाये रखती है। इसलिए भारत को सांस्कृतिक देश कहा जाता है।

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