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Ganpati Utsav: पुणे के 5 प्रसिद्ध गणपति , जानिए क्या है इनका इतिहास और क्यों है महत्व

Myjyotish Expert Updated 02 Sep 2022 11:27 AM IST
पुणे के 5 प्रसिद्ध गणपति , जानिए क्या है इनका इतिहास और क्यों है महत्व
पुणे के 5 प्रसिद्ध गणपति , जानिए क्या है इनका इतिहास और क्यों है महत्व - फोटो : myjyotish

पुणे के 5 प्रसिद्ध गणपति , जानिए क्या है इनका इतिहास और क्यों है महत्व


31 अगस्त 2022 दिन बुधवार से पूरे भारत में गणेश उत्सव बड़े धूम धाम से मनाया जा रहा है। ये उत्सव 10 दिनों तक चलने वाला है।हर जगह गणपति के आने से खुशी का माहौल बना रहता है। इस त्योहार को देश के अलग–अलग हिस्सों में अलग ही धूम रहती है। वैसे गणेश उत्सव सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में महशूर है। महाराष्ट्र के कई शहरों में भव्य गणपति पंडाल लगते है। कोरोना काल के दो सालों में त्योहार प्रतिबंधों की वजह से फीके रहे।लेकिन इस बार गणेश भक्तों में जबर्दस्त उत्साह दिखाई दे रहा है। 

लोकमान्य तिलक की केसरी नाम की संस्था ने केसरीवाडा नामक स्थान पर गणेश उत्सव सन् 1894 में शुरू किया था। कसबा के गणेश उत्सव की शुरुआत इससे भी पहले सन् 1893 में हुई थी। आइए जानते है पुणे के 5 प्रसिद्ध और ऐतिहासिक महत्व वाले गणपति के बारे में :–

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कसबा गणपति

महाराष्ट्र में सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक कसबा गणपति मंदिर है। इसे 1639 में शिवाजी महाराज और जीजाबाई द्वारा स्थापित किया गया। ये मंदिर पुणे शहर के मध्य में स्थित होने की वजह से पुणे के स्थानीय देवता कहे जाते है। गणपति ग्राम देवता होने के कारण यहाँ रहने वालों के रक्षक देव भी हैं। कसबा गणपति की मूर्ति साढ़े तीन फुट की होती है। कसबा गणपति के विसर्जन की काफी चर्चा होती है। इसमें बड़ी तादाद में गणेश भक्त शामिल होते हैं। 

तांबडी जोगेश्वरी के गणपति की भी खूब है प्रसिद्धि

कसबा गणपति की तरह ही तांबडी जोगेश्वरी गणपति भी बहुत प्रसिद्धि है। पीतल के देवालय में इनकी स्थापना की जाती है। मन्नतों वाले गणपति और बाकी प्रसिद्ध गणपति की मूर्तियां स्थापित हो जाती हैं उनके विसर्जन की परंपरा नहीं है। लेकिन तांबडी जोगेश्वरी की मूर्ति हर साल गणपति भक्त विसर्जित करने जाते है। 

गुरुजी तालीम गणपति, इसलिए खास कही जाती यह मूर्ति

हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक गुरुजी तालीम मंडल है। गुरुजी तालीम मंडल के गणपति की सबसे खास बात यह है कि मूर्ति लोकमान्य तिलक द्वारा सार्वजनिक गणेश उत्सव शुरू किए जाने से पहले से ही शुरू है। बताई जाति है की इसकी शुरुआत एक कुश्ती के आखाड़े के सदस्यों ने करवाई थी। लेकिन वर्तमान में यह आखाड़ा अस्तित्व में नहीं है। यहां पर गणपति एक बेहद ही आकर्षक और बड़े चूहे पर विराजमान दिखाई देते हैं। जिनका दर्शन करने दूर दूर से बप्पा के भक्त आते है।


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तुलसीबाग गणपति की भी है बहुत प्रसिद्धि

महाराष्ट्र में गणपति की मूर्ति हर प्रसिद्ध जगह कुछ अलग–अलग ही आती है। जैसे की तुलसीबाग गणपति की मूर्ति अपनी ऊंचाई के लिए बेहद प्रसिद्ध है। दक्षित तुलसीवाले ने सन् 1900 में यहां गणेश उत्सव की शुरुआत की थी। यहां के गणपति की सबसे खास बात  की मूर्ति फाइबर की होती है।

केसरीवाडा के गणपति भी हैं काफी मशहूर, ख्याति इनकी दूर-दूर

लोकमान्य तिलक की केसरी नामक संस्था ने यह गणेश उत्सव सन् 1894 से शुरू किया था। केसरीवाडा के गणपति की पहचान मन्नतों वाले गणपति के तौर पर होती है। जो भी भक्त यहां पर अपनी जो भी मुरादे ले कर आता है, वो कभी भी निराश होकर नहीं जाता है। यहां के गणपति का विसर्जन बहुत ठाठ से होता है। विसर्जन के समय यहां गणपति को पालखी में बिठाकर उनका जुलूस निकाला जाता है। कुछ जगहों के गणपति के विसर्जन का समय और। सड़के दोनों अलग होती है।
ऊपर के चारों गणपति की मूर्तियां विसर्जन के लिए लक्ष्मी सड़क से होकर जाती है, जबकि केसरी वाडा के गणपति को विसर्जन के लिए केलकर सड़क से ले जाया जाता है।

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