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Kanakadhara Stotram: इस एक स्त्रोत से दूर हो जाएंगी आपकी सभी धन संबंधी दिक्क्तें जानें इसका भेद

Acharya Rajrani Sharma Updated 04 Jan 2024 01:28 PM IST
Kanakadhara Stotram
Kanakadhara Stotram - फोटो : google

खास बातें

Kanakadhara Stotram: इस एक स्त्रोत से दूर हो जाएंगी आपकी सभी धन संबंधी दिक्क्तें जानें इसका भेद 

Kanakadhara Stotram importance कनकधारा स्त्रोत का पाठ सभी प्रकार की आर्थिक तंगी को दूर कर देने वाला स्त्रोत है. जो वेदों का ज्ञान देता है और पुण्य प्रभाव से धन का आगमन होता है. 

Kanakadhara Stotram: इस एक स्त्रोत से दूर हो जाएंगी आपकी सभी धन संबंधी दिक्क्तें जानें इसका भेद 


Kanakadhara Stotram importance कनकधारा स्त्रोत का पाठ सभी प्रकार की आर्थिक तंगी को दूर कर देने वाला स्त्रोत है. जो वेदों का ज्ञान देता है और पुण्य प्रभाव से धन का आगमन होता है. 

kanakadhara stotram benefits कनक धारा स्त्रोत जीवन की समस्त धन संबंधी परेशानियों को पल भर में कर सकता है दूर. जीवन में आर्थिक संपन्नता की इच्छा हम सभी के मन में होती है. लेकिन कई बार हमारे प्रयासों के द्वारा भी हम उतना सब नहीं प्राप्त कर पाते हैं जो हमें मिलना चाहिए था. तब उस स्थिति में ज्योतिष अनुसार आप कर पाएं तो उसके तुरंत प्रभाव जीवन में पड़ते हैं. 
 

 

मां लक्ष्मी पूजन का प्रभाव Effect of worshiping Goddess Lakshmi

Goddess Lakshmi माँ लक्ष्मी धन संपदा को प्रदान करने वाली देवी हैं तथा सभी में एक प्रमुख देवियों में से एक हैं. वह भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हैं और धन, समृद्धि, को प्रदान करने वाली होती है. इन्हीं के निमित्त कनकधारा स्त्रोत का जाप भक्तों की सभी आर्थिक परेशानियों को दूर कर देने वाला होता है. समृद्धि की देवी के रूप में जाना जाता है.

इनकी पूजा करने से धन-संपदा में कभी कमी नहीं आती. घर का भंडार हमेशा भरा रहता है. धन की प्राप्ति के लिए मां लक्ष्मी का स्मरण करना चाहिए और इस स्त्रोत कापाठ अवश्य करना चाहिए. प्रतिदिन लक्ष्मी का कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर लेने से जीवन में सुखों का आगमन होता है. मां लक्ष्मी के इस स्त्रोत का पाठ करने से मां लक्ष्मी की असीम कृपा प्राप्त होती है. 

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कनक धारा स्त्रोत विधि नियम 

कनक धारा स्त्रोत जीवन में आर्थिक संपन्नता को प्रदान करने वाला स्त्रोत है. कई बार हमारे प्रयासों के द्वारा भी हम उतना सब नहीं प्राप्त कर पाते हैं जो हमें मिलना चाहिए था. तब उस स्थिति में ज्योतिष अनुसार आप कर पाएं तो उसके तुरंत प्रभाव जीवन में पड़ते हैं. 

इस स्त्रोत का पाठ शुद्ध चित्त मन के साथ किया जाना चाहुए. पूजा के समय सफेद या गुलाबी रंग के कपड़े पहनने चाहिए. कमल के फूल पर बैठी हुई देवी लक्ष्मी की मूर्ति की पूजा करनी चाहिए. तथा माता को लाल पुष्प अर्पित करने चाहिए. 

कनकधारा स्तोत्रम्

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् .
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥१॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि .
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि .
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् .
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥

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बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति .
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव 
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥६॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन .
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥७॥

दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे .
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥८॥

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इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते .
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥९॥

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति .
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥१०॥

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै .
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥११॥

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै .
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥१२॥

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि .
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥१३॥

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः .
संतनोति वचनाङ्गमानसैस्
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥१४॥

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे .
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥१५॥

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् .
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥१६॥

कमले कमलाक्षवल्लभे
त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः .
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥१७॥

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् .
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥१८॥
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