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Devshayani Ekadashi 2022: क्या वाकई देवशयनी एकादशी पर सो जाते हैं देव

MyJyotish Expert Updated 08 Jul 2022 03:52 PM IST
क्या वाकई देवशयनी एकादशी पर सो जाते हैं देव
क्या वाकई देवशयनी एकादशी पर सो जाते हैं देव - फोटो : google

क्या वाकई देवशयनी एकादशी पर सो जाते हैं देव या देव निद्रा के हैं, कोई और मायनेl


कहा जाता है कि देवशयनी एकादशी के दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु 4 महीनों के लिए निद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर जाते हैं . जाने इस मान्यता के पीछे क्या तथ्य हैl आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है. देव शयनी एकादशी को शास्त्रों में बहुत ही महत्वपूर्ण माना है. मान्यता है, कि  इस एकादशी से जगत के पालनहार भगवान विष्णु चार महीनों के निंद्रा के लिए चले जाते हैं.

इन 4 महीनों में जगत के संचालन का जिम्मा भगवान शिव के हाथों में होता है . वही पृथ्वी की रक्षा करते हैं और सारा कार्यभार भी संभालते हैं. देव के निद्रा में चले जाने के कारण इस एकादशी को देवशयनी और हरीशयनी एकादशी कहा जाता है .हरी शयन के चार महीनों के निद्रा काल को चातुर्मास कहां जाता है. चातुर्मास को पूजा पाठ के लिए विशेष माना जाता है लेकिन इस बीच किसी भी तरह के शुभ काम का करना वर्जित होता हैl

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कार्तिक मास में देव उठनी एकादशी पर जब भगवान नारायण योग निद्रा से जागते  हैं. उसी दिन से मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है. इस बार देवशयनी एकादशी 10 जुलाई को है. ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि क्या वाकई देवशयनी  एकादशी पर देव सो जाते हैं या कोई और भी मायने हैंl यहां इसके बारे में समझेंगे.

समझे देवशयन और देव जागरण के मायने: ज्योतिषाचार्य डॉ अरविंद मिश्र की माने तो जो चैतन्य तल पर हमेशा जागृत अवस्था में रहता हो उसे ईश्वर माना गया हैl ऐसे में हमेशा जागने वाला ईश्वर इतनी लंबी अवधि के लिए भला सो कैसे सकता है? वास्तव में देवशयन और देव जागरण ऋषि-मुनियों द्वारा आम लोगों के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं हैं l ताकि लोगों को धर्म से जोड़ा जा सके और उनके जीवन को समय के अनुसार व्यवस्थित किया जाए l देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी के समय तक मौसम में बदलाव की स्थिति होती है, ऐसे में इन दिनों को मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित कर ,लोगों को कुछ नियमों के पालन करने के लिए बोला गया हैl

इसलिए बनाए गए हैं नियम:

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास में होती है. इसके कुछ दिन बाद ही सावन की शुरुआत होती है. सावन का महीना वर्षा ऋतु का महीना है .वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद सर्दियों का आगमन होने लगता है यानी चातुर्मास के यह महीने मौसम के बदलाव के महीने होते हैं. मौसम में बदलाव होने पर हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है. सर्दी- जुकाम और फ्लू और संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है. मौसम में बदलाव के कारण हमारा शरीर बीमारियों को जल्दी पकड़ लेता है. तमाम सब्जियों - फलों में कीड़े पनपने लगते हैं. सामान्य जनजीवन बारिश के कारण थोड़ा अस्त-व्यस्त और  ग्रहकेंद्रित हो जाता है. इस कारण इन 4 महीनों में शुभ कार्यों को न करने खानपान को लेकर सावधानी बरतने और संयमित जीवन जीने की सलाह दी जाती हैl

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 क्या करना है शुभ:
  •  इन 4 महीनों में व्यक्ति को खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए ईश्वर की आराधना करनी चाहिएl
  •  तला ,भुना, गरिष्ठ भोजन दूध और अन्य डेरी प्रोडक्ट का सेवन नहीं करना चाहिए हल्का सुपाच्य ,भोजन सात्विक भोजन करना चाहिए. एक समय भोजन करना सर्वश्रेष्ठ है l
  • चातुर्मास के दौरान वर्षा काल रहता है .ऐसे में कई तरह के कीड़े मकोड़े पनपते हैं ऐसे में बैंगन, गोभी ,मूली और हरी पत्तेदार सब्जियां नहीं खानी चाहिएl
  •  यानी कि उन से परहेज करना चाहिएl
  •  इम्यूनिटी को मजबूत करने के लिए योग और प्राणायाम करते रहना चाहिए. बारिश के कारण जब जन -जीवन और व्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त होने के कारण इस बीच किसी भी तरह के शुभ कार्यों को करने की मनाही हैl

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