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Akshaya Tritiya: जानें किस कारण से जैन धर्म का अक्षय तृतीया से है खास नाता

Myjyotish Expert Updated 04 May 2022 11:08 AM IST
जानें किस कारण से जैन धर्म का अक्षय तृतीया से है खास नाता
जानें किस कारण से जैन धर्म का अक्षय तृतीया से है खास नाता - फोटो : google

जानें किस कारण से जैन धर्म का अक्षय तृतीया से है खास नाता


जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जिन्हें ऋषभनाथ भी कहते हैं। उनका जन्म चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि के दिन सूर्योदय के समय हुआ था। वह इतने महान थे कि उन्हें जन्म से ही संपूर्ण शास्त्रों का एवं समस्त कलाओं का ज्ञान था। वे सरस्वती के स्वामी थे। जब आदिनाथ युवा हुए तो उनका विवाह नंदा और सुनंदा के साथ हुआ था। नंदा से ऋषभनाथ को पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम भरत था जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट बने थे।

जैन धर्म के अनुयायियों की मान्यता है कि उन्हीं के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा। भगवान आदिनाथ के  सौ पुत्र थे और दो पुत्रियां जिनका नाम ब्राह्मी और सुंदरी था। भगवान ऋषभनाथ ने ही सबसे पहले प्रजा को कृषि, विद्या, शिल्प वाणिज्य-व्यापार आदि के लिए प्रेरित किया था। कहते हैं कि इससे पहले प्रजा की सभी जरूरतें कल्पवृक्ष पूरी किया करते थे। ‘कृषि करो या ऋषि बनो’ उनका सूत्र वाक्य था।

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ऋषभनाथ ने हजारों वर्षों तक राज्य किया और फिर अपने राज्य को अपने पुत्रों में विभाजित कर दिगंबर तपस्वी बन गए थे।
कहते हैं कि जब वह भिक्षा मांगने जाते थे तो लोग उन्हें सोना, चांदी,  हीरे,  रत्न आदि देते थे परंतु कोई उन्हें भोजन नहीं देता था जिसके कारण उनके साथ जो सैकड़ों अनुयायी जुड़े थे उन्हें भूखे रहना पड़ता था लेकिन जब उनसे भूख बर्दाश्त नहीं हुई तो उन्होंने आदिनाथ से हटकर अपने अलग-अलग समूह बनाने का प्रारंभ किया और यहीं से जैन धर्म में अनेक संप्रदायों की शुरुआत हुई थी।

जैन धर्म में मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं। इसी कारण से आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा था। इसके बाद वह हस्तिनापुर अपने पुत्र श्रेयांश के राज्य पहुंचे। वहाँ पर उनके पुत्र ने उन्हें गन्ने का रस भेट किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। जिस दिन गन्ने का रस पीकर भगवान आदिनाथ ने अपना उपवास तोड़ा था वह दिन अक्षय तृतीया का दिन था। इसी कारण से अक्षय तृतीया  से जैन धर्म के अनुयायियों का काफी खास नाता है। 

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इस प्रकार हज़ार वर्ष तक कठोर तप करके ऋषभनाथ को भूत, भविष्य और वर्तमान का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ और वह जिनेन्द्र बन गए। पूर्णता प्राप्त करने के बाद गन्ने के रस से उन्होंने अपना मौन व्रत तोड़ा और संपूर्ण आर्य खंड में लगभग 99,000 वर्ष तक धर्म विहार कर लोगों को उनके कर्तव्य और जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्ति पाने के उपाय बताएं।   कहते हैं कि जब उनकी आयु के मात्र 14 दिन शेष रह गए थे तो वे हिमालय पर्वत के कैलाश शिखर पर समाधि लीन हो गए और माघ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

भगवान ऋषभनाथ को भगवान विष्णु के 23 अवतारों में से आठवां अवतार माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन भगवान ऋषभनाथ  ने हस्तिनापुर में गन्ने का रस पीकर अपना व्रत खोला था। आज भी हस्तिनापुर में जैन धर्मावलंबी अक्षय तृतीया के दिन गन्ने का रस पी कर अपना उपवास तोड़ते हैं।

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