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Home ›   Blogs Hindi ›   RinMochan Mangal Stotra: This one sutra can provide relief from even the biggest debt.

RinMochan Mangal Stotra: यह एक स्त्रोत दिला सकता है बड़े से बड़े कर्ज से मुक्ति

my jyotish expert Updated 15 Nov 2023 01:29 PM IST
RinMochan Mangal Stotra
RinMochan Mangal Stotra - फोटो : google
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जीवन में यदि भी भी कर्ज की समस्या परेशानी देती है तो जरूरी है कि एक स्त्रोत का पाठ करना बेहद ही शुभ फल देने वाला होता है. कर्ज हो तो करें इस मंगल स्त्रोत का पाठ. ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ जीवन में बड़े से बड़े कर्ज को दूर कर देने में सहायक होता है. 

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कहीं पर धन अटका हुआ है या कर्ज हो तो मात्र इस स्त्रोत का उपाय किया जाना उत्तम माना गया है. मंगल स्त्रोत का प्रभावी पौराणिक मंत्र जीवन को सुखमय बना देता है. कुछ उपाय जीवन में बड़े बदलाव को दिखाते हैं. 

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मंगल स्त्रोत पाठ प्रभाव 
मंगल स्त्रोत को एक बहुत ही विशेष तथा प्रभावी स्त्रोत माना गया है. यह जीवन में कई तरह के सुख प्रदान करता है. यह न सिर्फ ऋण से मुक्ति दिलाने में सहायक बनता है अपितु जीवन में मौजूद कष्टों को भी दूर करता है. कुंडली में मौजूद निर्बल मंगल की स्थिति को भी यह स्त्रोत अनुकूल करता है. कई प्रकार के लाभ देने में यह एक स्त्रोत अत्यंत शुभदायक बनता है. इस स्त्रोत का पाठ भक्ति एवं निष्ठा के साथ करने पर विशेष परिणाम दिलाने वाला होता है.

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः।।

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः।।

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः।।

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्।।

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्।।

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्।।

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय।।

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।।

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्।।

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः।।

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः।।

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा।।

।। इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।
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