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Home ›   Blogs Hindi ›   Gupt Navratri: Goddess Tara is worshiped on day 2 of Gupt Navratri.

Gupt Navratri 2 : गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन होती है देवी तारा की साधना

Acharya Rajrani Sharma Updated 10 Feb 2024 11:35 AM IST
Gupt Navratri
Gupt Navratri - फोटो : my jyotish

खास बातें

Gupt Navratri 2 : गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन होती है देवी तारा की साधना

Magh Gupt Navratri 2024: माघ माह गुप्त नवरात्रि के दिन देवी तारा का पूजन किया जाता है. इस दिन माता के इस पूजन के साथ ही भक्त को शुभ फल मिलते हैं.

Gupt Navratri 2 : गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन होती है देवी तारा की साधना


Magh Gupt Navratri 2024: माघ माह गुप्त नवरात्रि के दिन देवी तारा का पूजन किया जाता है. इस दिन माता के इस पूजन के साथ ही भक्त को शुभ फल मिलते हैं.

Das Mahavidya : देवी तारा दस महा विद्या में विशेष स्थान रखती हैं माता का पूजन भक्तों को सुख प्रदान करने वाला माना गया है. माता के पूजन द्वारा सुख प्राप्त होते हैं. जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होने लगती हैं.

तारा माता का पूजन ज्योतिष में सबसे शक्तिशाली पूजन में से एक है. परेशानियों से बचने के लिए देवी का पूजन एवं मंत्र जाप करने से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं. तारा देवी का पूजन जब होता है भक्त को शांति का सुख प्राप्त होता है. गुप्त नवरात्रि में जहां देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है. 

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साधना के लिए विशेष समय

गुप्त नवरात्रि का दूसरा दिन साधना एवं शक्ति प्राप्त के लिए विशेष होता है. देवी मां के पूजन एवं मंत्रों का जाप करने से भक्ति की शक्ति में वृद्धि होती है. भक्तों की हर शुभ इच्छा देवी जल्द ही पूरी करती हैं. गुप्त नवरात्रि के दौरान दस महाविद्याओं के पूजन करने से साधक के जीवन से जुड़ी बड़ी से बड़ी परेशानियां पलक झपकते ही दूर हो जाती हैं. गुप्त नवरात्रि के पुण्य प्रभाव से साधक के जीवन में पूरे वर्ष सुख-सौभाग्य बना रहता है. इस दिन का प्रभाव जीवन में किसी भी प्रकार के शत्रु या बाधा का भय समाप्त कर देने वाला होता है.
 

गुप्त नवरात्रि के समय देवी तारा पूजन महत्व

गुप्त नवरात्रि के समय माता तारा का पूजन बहुत ही शुभदायक होता है. धर्म शास्त्रों में सबसे शक्तिशाली पूजन में से इसे एक कहा गया है. मान्यताओं के अनुसार जीवन में परेशानियों से बचने के लिए देवी का पूजन एवं मंत्र जाप करने से हर प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं. देवी का पूजन भक्तों को शक्ति एवं बल प्रदान करता है. इस पूजन के द्वारा शक्ति के साथ आत्मिक शांति का सुख प्राप्त होता है. गुप्त नवरात्रि में जहां देवी के नौ स्वरूपों की पूजा शक्ति के रुप में होती है उसी प्रकार एवं साधना के लिए भी की जाती है. गुप्त नवरात्रि में गुप्त रूप से उनकी पूजा करने का विधान प्राचीन पौराणिक ग्रंथों में प्राप्त होता है. शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति गुप्त नवरात्रि के दौरान तन और मन से पवित्र होकर शक्ति की पूजा करता है उसके जीवन में आने वाली बाधाएं स्वतं ही समाप्त होने लगती हैं.

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माँ तारा स्तोत्र

मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसम्पत्प्रदे प्रत्यालीढपदस्थिते शवहृदि स्मेराननाम्भोरुहे .

फुल्लेन्दीवरलोचनत्रययुते कर्तीकपालोत्पले खड्गं चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये॥ १॥

वाचामीश्वरि भक्तकल्पलतिके सर्वार्थसिद्धीश्वरि सद्यः प्राकृतगद्यपद्यरचनासर्वार्थसिद्धिप्रदे.

नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारांनिधे सौभाग्यामृतवर्षणेन कृपया सिञ्च त्वमस्मादृशम्॥ २॥

खर्वे गर्वसमहपूरिततनो सर्पादिभूषोज्ज्वले व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते.

सद्यःकृत्तगलद्रजःपरिलसन्मुण्डद्वयीमूर्धज ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय॥ ३॥

मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्धचन्द्रात्मिकेहुंफट्कारमयि त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशः.

मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा परावेदनां नहि गोचरा कथमपि प्राप्तां नु तामाश्रये॥ ४॥

त्वत्पादाम्बुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतांतस्य श्रीपरमेश्वरी त्रिनयनब्रह्मादिसौम्यात्मनः.

संसाराम्बुधिमज्जने पटुतनून् देवेन्द्रमुख्यान् सुरान्मातस्त्वत्पदसेवने हि विमुखान् को मन्दधीः सेवते॥ ५॥

मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिणस्ते देवासुरसंगरे विजयिनो निःशङ्कमङ्के गताः.

देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्द्धां वहन्तः परेतत्तुल्या नियतं तथा चिरममी नाशं व्रजन्ति स्वयम्॥ ६॥

त्वन्नामस्मरणात् पलायनपरा द्रष्टुं च शक्ता न ते भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षाश्च नागाधिपाः.

दैत्या दानवपुङ्गवाश्च खचरा व्याघ्रादिका जन्तवोडाकिन्यः कुपितान्तकाश्च मनुजा मातः क्षणं भूतले॥ ७॥

लक्ष्मीः सिद्धगणाश्च पादुकमुखाः सिद्धास्तथा वारिणांस्तम्भश्चापि रणाङ्गणे गजघटास्तम्भस्तथा मोहनम्.

मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिद्ध्यन्ति ते ते गुणाः कान्तिः कान्ततरा भवेच्च महती मूढोऽपि वाचस्पतिः॥ ८॥

ताराष्टकमिदं रम्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः. प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः॥ ९॥

लभते कवितां दिव्यां सर्वशास्त्रार्थविद् भवेत्. लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्॥ १०॥

कीर्ति कान्तिं च नैरुज्यं सर्वेषां प्रियतां व्रजेत्.विख्यातिं चैव लोकेषु प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात्॥ ११॥

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