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Home ›   Blogs Hindi ›   Why Kavad Yatra is done in the month of Sawan, know its importance and rules

Sawan Kawad: सावन के महीने में क्यों की जाती है कावड़ यात्रा? जानें महत्व और नियम

Nisha Thapaनिशा थापा Updated 04 Jul 2024 10:39 AM IST
कावड़ यात्रा का महत्व
कावड़ यात्रा का महत्व - फोटो : My Jyotish

खास बातें

Sawan Kawad: सावन में कावड़ यात्रा का पौराणिक महत्व है, लेकिन कावड़ यात्रा के लिए कुछ नियम भी बताए गए हैं, जिसका पालन हर एक कावड़िया को करना चाहिए। तो आइए इस लेख में जानते हैं कि कावड़ यात्रा का क्या महत्व है और नियम क्या है। 
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Sawan Kawad: सावन का महीना पवित्र महीने में से एक है। इस महीने में भगवान शिव की विशेष रूप से पूजा अर्चना की जाती है। सावन के महीने में ही कावड़ियां दूर तीर्थ स्थलों से गंगा का जल लेकर आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सावन के महीने में कावड़ का क्या महत्व है? यदि आप भी सावन के महीने में कावड़ यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो उससे पहले नियमों के विषय में जान लें। तो आइए इस लेख में जानते हैं कि सावन के महीने में कावड़ यात्रा क्यों की जाती है और इसका क्या पौराणिक महत्व है और कावड़यों को किन नियमों का पालन करना चाहिए। 
 

सावन महीने में कावड़ का महत्व (sawan me kawad ka mahatva)


श्रावण यानि कि सावन का महीना 22 अगस्त जुलाई से शुरू हो रहा है और इसका समापन 19 अगस्त को होगा और इस दौरान कावड़िया विशेष रूप हर्षों उल्लास के साथ गंगा का जल लेने के लिए दूर तीर्थ में जाते हैं। कावड़ यात्रा से पहले कावड़ियां बांस की लकड़ी पर अपने दोनों टोकरियों को बांधते हैं और उसे तीर्थ स्थल पर ले जाकर उसमें गंगाजल लेकर आते हैं। भक्त जन अपनी यात्रा के दौरान इन टोकरियों को निरंतर अपने कंधे पर ही रख कर आते हैं। इसमें से कुछ लोग नंगे पैर ही पैदल यात्रा करते हैं, हालांकि कुछ लोग कावड़ यात्रा के लिए ट्रक आदि वाहनों का सहारा लेते हैं। लेकिन कहा जाता है कि सच्चे कावड़िए को नंगे पैर पैदल ही कावड़ यात्रा करनी चाहिए।
 

कावड़ यात्रा का पौराणिक महत्व ( kawad yatra ka pauranik mahatava)


कावड़ यात्रा की कहानी कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार धार्मिक है। मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि भगवान परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। इसलिए वह भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सावन महीने में पुरा महादेव गए। उन्होंने अपनी कावड़ यात्रा के दौरान गढ़मुक्तेश्वर से गंगा का जल लिया और भगवान शिव का अभिषेक किया। कहा जाता है कि उस समय के बाद से कावड़ की यात्रा परंपरा के तौर पर चली आ रही है। उसके बाद से हर साल भगवान भोले के भक्त कावड़ यात्रा का हिस्सा बनते हैं और दूर तीर्थों से ज्यादा लेकर आते हैं और फिर उस जल से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।
 

कावड़ यात्रा के नियम (kawad yatra ke niyam)


कावड़ यात्रा के कुछ नियम भी हैं जिनका पालन हर एक कावड़िए को करना चाहिए। कहा जाता है कि कावड़ यात्रा के दौरान कावडिए को साधु की तरह रहना चाहिए। कावडिए को गंगा से जल लेने से लेकर शिवलिंग पर अभिषेक करने तक के सफर में नंगे पैर ही चलना चाहिए। कावड़ यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए और मांसाहार से बचना चाहिए। क्योंकि कुछ लोग इन दिनों भोले बाबा का प्रसाद कहकर भांग-धतुरे के सेवन करते हैं। इसके साथ ही किसी भी व्यक्ति से अनुचित व्यवहार नहीं करना चाहिए और अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। यह भी कहा जाता है कि कोई भी व्यक्ति बिना स्नान के कावड़ को नहीं छू सकता। इसके साथ यह कावड़ यात्रा के दौरान उन्हें तेल, साबुन कंघी आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। साथ में उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और एक साधु की तरह जीवन जीना चाहिए।

तो इस प्रकार से हर एक कावड़िया को नियमों का पालन करना चाहिए। यदि आप इससे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क करें। 

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