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Home ›   Blogs Hindi ›   What is the relation of Nishkramana Sanskar with the eyes of the child? Know its importance

Nishkramana Sanskar: निष्क्रमण संस्कार का शिशु के नेत्रों से क्या संबंध है? जानें महत्व

Nisha Thapaनिशा थापा Updated 06 Jun 2024 02:31 PM IST
निष्क्रमण संस्कार का महत्व
निष्क्रमण संस्कार का महत्व - फोटो : My Jyotish

खास बातें

Nishkramana Sanskar: निष्क्रमण संस्कार के माध्यम से शिशु को पहली बार सूर्यदेव के दर्शन करवाए जाते हैं। यह संस्कार 16 संस्कार का छठा संस्कार है। कुछ स्थानों में नामकरण संस्कार में ही यह क्रिया संपन्न की जाती है, वहीं कुछ स्थानों में यह संस्कार 4 या 5वें महीने में किया जाता है। 
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Nishkramana Sanskar: 16 संस्कारों की सूची में छठा संस्कार निष्क्रमण संस्कार है और यह संस्कार जन्म के उपरांत किया जाने वाला तीसरा संस्कार है। इस संस्कार के माध्यम से शिशु को प्रथम बार सूर्य के प्रकाश में लेकर जाते हैं। यह संस्कार कुछ स्थानों में शिशु के नामकरण के दिन ही किया जाता है, तो वहीं कुछ स्थानों में यह संस्कर शिशु के जन्म के पांचवें महीने में किया जाता है। तो आइए जानते हैं कि इस संस्कार को 16 संस्कारों की सूची में क्यों सम्मिलित किया गया है।
 

निष्क्रमण संस्कार का महत्व


अन्य 5 संस्कारों की भांति इस संस्कार का भी काफी अधिक महत्व है। क्योंकि इस संस्कार के माध्यम से प्रथम बार शिशु को सूर्य देव के दर्शन करवाए जाते हैं।
अथ निष्क्रमणं नाम गृहात्प्रथमनिर्गम: 
कहा जाता है कि निष्क्रमण संस्कार से पूर्व बच्चों को घर के भीतर ही रखना चाहिए। क्योंकि कहा जाता है कि जब शिशु जन्म लेता है तो उसकी आंखें बहुत ही कोमल होती हैं  सूर्य के तीव्र प्रकाश से उसकी आंखों पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। जिसके कारण भविष्य में शिशु की आंखों की रोशनी कम हो सकती है। इसी के साथ आपने देखा होगा कि भारतीय संस्कृति में महिलाएं अपने बच्चों को शीशा भी नहीं दिखती है, क्योंकि कहा जाता है कि शीशे की चमक भी बच्चों की आंखों पर प्रभाव डाल सकती है। इसलिए जब शिशु की आंखें घर की रोशनी, जैसे की लाइट और दीपक की ज्योत देखने की आदी हो जाती हैं, तब सूरज की रोशनी से उसकी आंखों पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।
 

कब और कैसे करना चाहिए निष्क्रमण संस्कार


निष्क्रमण संस्कार को लेकर आचार्य के अलग-अलग मत है, कुछ का कहना है कि यह संस्कार पांचवें महीने में करना चाहिए और कुछ आचार्य का कहना है की सुविधा अनुसार नामकरण संस्कार के दिन ही यह संस्कार संपन्न किया जा सकता है, इसलिए आपने देखा होगा कि बहुत से लोग अपने शिशु को 5 महीने से पूर्व घर से बाहर नहीं निकलते हैं। हालांकि बिना मंत्रोच्चार के माध्यम से भी यह संस्कार किया जा सकता है, लेकिन यदि यह संस्कार मंत्रों के माध्यम से संपन्न किया जाता है, तो शिशु को शारीरिक के साथ मानसिक रूप से बहुत लाभ मिलता है। निष्क्रमण संस्कार के माध्यम वैदिक विधि द्वारा देवताओं,  दिशाओं और पंचत्व को  किसी जलपात्र में आवह्न करके उनके नाम एवं मंत्रों से पूजन किया जाता है। इसके बाद "ॐ तच्च्क्षुर्देवहितं" मंत्र का जप करके शिशु को सूर्य देव के दर्शन करवाने चाहिए। 

यदि आप भी अपने शिशु का निष्क्रमण संस्कार करवाना चाहते हैं या फिर इससे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क करें। 

 

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