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शुक्र अस्त होने से क्या है तात्पर्य (मतलब)

पंडित भरतलाल शास्त्रीपंडित भरतलाल शास्त्री Updated 05 Jun 2020 02:16 PM IST
What is meant by the death of Venus?
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार – “सूर्येणास्तम्भन सह” अर्थात सूर्य के साथ ( अधिक निकट आ जाना)  अर्थात शुक्र का सूर्य से दूरी 9° या इससे कम हो जाना

(यदि शुक्र वक्री चल रहा है तो वह सूर्य से 7 अंश या इससे अधिक समीप आये) ही शुक्र ग्रह अस्त कहलाता है। शुक्र अपनी गति से भ्रमण करते हुये जब सूर्य के सानिध्य में आते हैं तब उनका सूर्यकिरणों में निमग्न होने के कारण शुक्र दिखाई नहीं देते हैं। इसी घटना को शुक्र अस्त कहते हैं। इसी तरह जब वे सूर्य से दूर हट कर अर्थात सूर्य से शुक्र की दूरी 9° से अधिक हो जाए तो शुक्र दिखाई देने लगते हैं। इसे ही शुक्रोदय कहा जाता है।

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गुरू और शुक्र ग्रह का उदय और अस्त होना ज्योतिष और मुहूर्त की दृष्टी से बेहद महत्वपूर्ण है। गुरु और शुक्र का अनुकूल होना जातक के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। यही कारण है कि शुक्रास्त में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि शुक्र के बलहीन होने के कारण अच्छे परिणाम नहीं प्राप्त होते। शुक्र ग्रह पूर्व में अस्त होने के बाद 75 दिनों पश्चात पुन: उदित होता है। उदय के 240 दिन वक्री चलता है। इसके 23 दिन पश्चात अस्त हो जाता है। पश्चिम में अस्त होकर 9 दिन के पश्चात यह पुन: पूर्व दिशा में उदित होता है।

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शुक्रास्त और शुक्रोदय के बीच की अवधि:

शुक्रवार्द्धक्यारम्भ- 28 मई 2020 गुरूवार  रात्रि 10:32 बजे से
पश्चिम में शुक्रास्त- 30 मई 2020 शनिवार रात्रि 10:32बजे से
पूर्व में शुक्रोदय- सोमवार 09 जून 2020 की अपराह्न 02:08 बजेसे
शुक्र बालत्व निवृत्ति- गुरूवार12 जून 2020 की अपराह्न 02:08 बजे से
(शुक्रास्त से 5 दिन पूर्व ही शुक्र वृद्ध हो जाता है अतः 5 दिन पूर्व से ही शुभ कार्य न करें। उसी तरह यही शुक्रोदय पूर्व दिशा में हो तो 5 दिन जबकि शुक्रोदय पश्चिम में होने पर 7 दिन तक शुक्र बाल्यावस्था में होता है अतः इस दौरान भी शुभ कार्य न करें।)

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शुक्रास्त रहने पर कौन-कौन से कार्य न करें:
कहा गया है-
"शुक्रे चास्तं गते जीवे चन्द्र वास्तमुपागते।
तेषां वृद्धि च बाल्ये च शुभकर्म भयप्रदम्।"
अर्थात् शुक्र चन्द्र गुरू के अस्त होने में व वृद्धत्वव बलात् में शुभ कार्य करने से भय ही मिलता है। इसी तरह कहा गया है-
शुक्र नष्टे गुरौ सिंह गुर्वादित्ये मलिम्लुचे।
गृहकर्म व्रतं यात्रा मनसापि न चिन्तयेत।।
अर्थात् शुक्र के अस्त होने पर, सिंह में गुरू स्थितिवश गुरूवादित्य और मलमास में  ग्रहप्रवेश, ग्रहारंभ, यात्रा, व्रतबंध का मन से भी चिन्तन नहीं करना चाहिये।

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ज्योतिष शास्त्र में गुरु और शुक्र को तारा कहा जाता है, जब गुरु और शुक्र अस्त हो जाते है तब कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता । गुरु और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह है और किसी भी शुभ कार्य को करने में ये बहुत महवत्पूर्ण भूमिका निभाते है, जहाँ एक ओर गुरु विद्या, संतान ओर बुद्धि के कारक है वही शुक्र सुख समृद्धि देने वाले है। यदि ये दोनों ग्रह अस्त हो जाए को कोई भी कार्य हमे अच्छा परिणाम नहीं देता और उस समय ये निम्नलिखित कार्य नहीं करने चाहिए –
शुक्र अस्त रहने की स्थिति में मंदिर निर्माण का प्रारम्भ और देव प्राण प्रतिष्ठा नहीं करना चाहिए।
शुक्र के अस्त होने पर विवाह कदापि नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त सगाई भी नहीं करना चाहिए।
शुक्र अस्त रहने पर यात्रा नहीं करना चाहिए। वधुओं और कन्याओं का द्विरागमन (दोनगा) भी नहीं होता।

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शुक्र के अस्त होने की स्थिति में कर्णभेदन, मुंडन आदि नहीं करवाना चाहिए सगाई नहीं करनी चाहिए
इस दौरान घर निर्माण आदि का कार्य शुरू नहीं करना चाहिए और न ही गृह प्रवेश करवाना चाहिए।
शुक्रास्त रहने पर न तो कोई नया व्रत शुरू करना चाहिए और न ही व्रत का उद्यापन करना चाहिए।
कुआं, तालाब आदि नहीं खुदवाना चाहिए।
शुक्रास्त के दौरान तुला दान भी नहीं करना चाहिए।
नामकरण, अन्न-प्राशन, यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ संस्कार) और गुरु-दीक्षा संस्कार भी नहीं करवाना चाहिए।

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क्या उपाय करें:
शुक्रास्त के दौरान आपके जो भी आराध्य देव हों उनकी नियमित आराधना करें। जिन लोगों ने किसी गुरु से दीक्षा ले रखी है, वे गुरु मंत्र का जाप करें। शिवलिंग पर प्रतिदिन जल अर्पित करें। प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को गाय के कच्चे दूध से शिवजी का अभिषेक करें।
भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कौवे, और कुत्ते को दें। शुक्रवार का व्रत रखें और उस दिन खटाई न खाएं। स्वयं को और घर को साफ-सुथरा रखें और हमेशा साफ कपड़े पहनें। नित्य नहाएं। शरीर को जरा भी गंदा न रखें। सुगन्धित इत्र या सेंट का उपयोग करें और पवित्रता बनाये रखें। 'ॐ शुं शुक्राय नम:' मंत्र का प्रतिदिन जाप करें।विवाह लग्न मुहूर्त ज्ञात करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक माना गया है. जैसे - गुरु, शुक्र का अस्तांगत होना, चन्द्र अथवा सूर्य ग्रहण, पितृपक्ष, भीष्म पंचक आदि समय में विवाह करना शास्त्र संगत नहीं माना जाता है. वर-वधू के वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाये रखने के लिये विवाह (शादी) की तिथि ज्ञात करने के लिये सर्वश्रेष्ठ शुभ तिथि का उपयोग किया जाता है.

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शुभ विवाह की तिथि जानने हेतु वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. विवाह मुहूर्त के चयन में अनेक बातों को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक होता है तभी विवाह में शुभता बनी रहती है, जैसे वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया जाता है ।
विवाह की तिथि सदैव वर-वधू की कुण्डली में गुण-मिलान करने के बाद निकाली जाती है क्योंकि विवाह की तिथि तय होने के बाद, कुण्डलियों की मिलान प्रक्रिया नहीं करनी चाहिए । निम्न सारणी से विवाह मुहूर्त समय का निर्णय करने के लिये वर-कन्या की राशियों में विवाह की एक समान तिथि को विवाह मुहूर्त के लिये लिया जाता है । वर और कन्या की कुण्डलियों का मिलान कर लेने के पश्चात उनकी राशियों में जो-जो तारीखें समान होती हैं उन तारीखों में वर और कन्या का विवाह शुभ व ग्राह्य माना जाता है । उदाहरण के लिये मेष राशि के वर का विवाह कर्क राशि की कन्या से हो रहा हो तो दोनों के विवाह के लिये यदि तिथियाँ एक समान हों तो शुभ रहेंगी ।

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विवाह मुहूर्तों में त्रिबल शुद्धि, सूर्य-चन्द्र शुद्धि व गुरु की शुभता का ध्यान रखा गया है । सूर्य व गुरू स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री हों तो उन्हें शुभ और ग्राह्य मान लिया जाता है ।विवाह समय में अशुभ ग्रहों का यथाशक्ति दान व पूजन करवा लेना चाहिए ऎसा करने से वैवाहिक जीवन में शुभता बनी रहती है तथा मांगल्ये की प्राप्ति होती है । इन विवाह मुहूर्तों में सभी दोषो की गणना भी की गई है । जिन मुहूर्तों में गुरु की केन्द्र त्रिकोण में स्थिति है अथवा गुरु की शुभ दृष्टि भी पड़ रही है उनका परिहार हो जाता है जिससे उन मुहूर्तों को विवाह मुहूर्त में शामिल कर लिया जाता है।

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