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Home ›   Blogs Hindi ›   Vidyarambh Sanskar improves the future of the child, know its importance

Vidyarambh Sanskar: विद्यारंभ संस्कार से संवरता है शिशु का भविष्य, जानें इसका महत्व

Nisha Thapaनिशा थापा Updated 11 Jul 2024 04:31 PM IST
विद्यारंभ संस्कार
विद्यारंभ संस्कार - फोटो : My Jyotish

खास बातें

Vidyarambh Sanskar: विद्यारंभ संस्कार से बच्चों में विद्या का आरंभ किया जाता है। कहा जाता है कि यह संस्कार करने के बाद शिशु के विद्या से संबंधित कोई भी अड़चनें पैदा नहीं होती है। तो आइए जानते हैं कि विद्यारंभ संस्कार का क्या महत्व है और इसे कब किया जाता है।
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Vidyarambh Sanskar: विद्या आरंभ संस्कार या फिर अक्षारंभ संस्कार 16 संस्कारों की सूची में से एक संस्कार है। यह संस्कार मुंडन संस्कार के बाद किया जाता है, यानि कि यह संस्कार 16 संस्कारों का नौवां संस्कार है। यह संस्कार विद्या प्रारंभ करने से पहले किया जाता है। गीता में भी अक्षर आरंभ की महिमा बताई गई है। भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि अक्षरों में 'अ' कार मैं ही हूं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि "अक्षारं ब्रह्म परमं" यानी परम अक्षर ही परम परमात्मा है। लेकिन अब इस संस्कार की महत्वता खत्म हो गई है, क्योंकि अब लोग इस संस्कार करवाए बगैर ही अपने बच्चों के विद्यालय में भेज देते हैं। तो आइए इस लेख के जरिए जानते हैं कि विद्यारंभ संस्कार का क्या महत्व है और यह कब शुरू किया जाता है।
 

विद्यारंभ संस्कार का महत्व (vidhyarambh sanskar ka mahatva)


विद्यारंभ संस्कार में कहा जाता है कि यह संस्कार करने से शिशु के जीवन में विद्या ग्रहण करने में किसी भी प्रकार की अड़चनें नहीं आती है। जिस प्रकार से प्रत्येक शुभ कार्य से पूर्व गणेश जी की पूजा एवं उनका स्मरण किया जाता है, ठीक इसी प्रकार विद्यारंभ से पहले भी गणेश जी की पूजा का विधान है। विद्यारंभ संस्कार को लेकर फल श्रुति में उल्लिखित है, कि विद्या या विवाह जैसे संस्कारों से पूर्व गणेश जी की पूजा करने पर भविष्य में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती है। 
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न  जायते।।

 

कब करना चाहिए अक्षरांभ संस्कार? (kab karein vidhyarambh sanskar)

 

महर्षि मार्कण्डेयजी ने कहा है कि, "प्राप्तेSथ पंचमे वर्षे विद्यारम्भं तु कारयेत्" यानि, शिशु के पांच वर्ष होने पर विद्यांरभ संस्कार कर लेना चाहिए। इस संस्कार में गुरू या अध्यापक के द्वारा बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। इस संस्कार को पाटीपूजन भी  कहा जाता है। विद्यारंभ संस्कार को शिशु के पांच वर्ष होने के बाद किसी भी शुभ मुहूर्त में किया जा सकता है। 

आपने यदि रामायण या महाभारत टीवी में देखा हो, तो जब बालक पांच वर्ष के हो जाते हैं, तो उन्हें गुरुकुल भेजा जाता था और उससे पहले उनके घरों में हवन, यऋ आदि अनुष्ठान किए जाते थे, जो कि विद्यांरभ संस्कार होता था। इस संस्कार में उन्हें गुरुकुल के नियम बताए जाते हैं और आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

तो इस प्रकार से विद्यारंभ संस्कार शिशु के पांच साल के बाद किया जाता है। यदि आप भी इस संस्कार को अपने बच्चों के लिए करवाना चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क कर सकते हैं।

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