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Home ›   Blogs Hindi ›   Through Garbhadhan Sanskar, the brain of the child becomes sharp and his future is developed.

16 Sanskar: इस संस्कार से बच्चों का दिमाग होता है तेज और भविष्य बनता है उज्जवल

Shaily Prakashशैली प्रकाश Updated 03 Jul 2024 04:47 PM IST
गर्भाधान संस्कार
गर्भाधान संस्कार - फोटो : My Jyotish

खास बातें

16 Sanskar: सोहल संस्कारों से प्रथम संस्कार गर्भाधान संस्कार है और कहा जाता है कि इस संस्कार के द्वारा उत्तम संतान पैदा होती है। तो आइए जानते हैं कि इस संस्कार का क्या महत्व है।
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16 Sanskar: गौतम स्मृति शास्त्र में 40 संस्कारों का उल्लेख है। कुछ जगह 48 संस्कार भी बताए गए हैं। महर्षि अंगिरा ने 25 संस्कारों का उल्लेख किया है। वर्तमान में महर्षि वेदव्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार, 16 संस्कार प्रचलित हैं। इन संस्कारों से जहां मानव समाज सभ्य और संस्कारी बनता है वहीं इन संस्कारों का मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक महत्व भी है।

जन्मना जायते शुद्रऽसंस्काराद्द्विज उच्यते।

अर्थात: जन्म से सभी शुद्र होते हैं और संस्कारों द्वारा व्यक्ति को द्विज बनाया जाता है।
 

16 संस्कारों के नाम

 

गर्भाधानं पुंसवनं सीमंतो जातकर्म च। नामक्रियानिष्क्रमणेअन्नाशनं वपनक्रिया:।।

कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारंभक्रियाविधि:। केशांत स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह:।।

त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्कारा: षोडश स्मृता:(व्यासस्मृति 1/13-15)
 

1.गर्भाधान संस्कार, 2.पुंसवन संस्कार, 3.सीमन्तोन्नयन संस्कार, 4.जातकर्म संस्कार, 5.नामकरण संस्कार, 6.निष्क्रमण संस्कार, 7.अन्नप्राशन संस्कार, 8.मुंडन संस्कार, 9.कर्णवेधन संस्कार, 10.विद्यारंभ संस्कार, 11.उपनयन संस्कार, 12.वेदारंभ संस्कार, 13.केशांत संस्कार, 14.सम्वर्तन संस्कार, 15.विवाह संस्कार और 16.अन्त्येष्टि संस्कार।

 

गर्भधान संस्कार क्या है?

 

कामवासना से ग्रस्त मनुष्य गर्भाधान संस्कार पर ध्यान नहीं देता है। अधिकतर संतानों का जन्म एक संयोग या दुर्घटना की तरह होता है। ऐसी संतान का भविष्य भी अनिश्च्ति होता है। स्त्री और पुरुष के शारीरिक मिलन को गर्भाधान-संस्कार कहा जाता है। गर्भधान संस्कार के अंतर्गत उत्तम अन्न ग्रहण करने, पवित्र भावना, प्रेम और आनंद की स्थिति निर्मित की जाती है जिससे शरीर और मन का गुण धर्म बदल जाता है। इसके बाद बताए गए नियमों, तिथि, नक्षत्र आदि के अनुसार ही संतान के जन्म हेतु समागम करने का विधान है। गर्भस्थापन के बाद अनेक प्रकार के प्राकृतिक दोषों के आक्रमण होते हैं, जिनसे बचने के लिए भी यह संस्कार किया जाता है। जिससे गर्भ सुरक्षित रहता है। विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है जिसका भविष्य उज्जवल होता है।

गर्भाधान के संबध में स्मृतिसंग्रह में लिखा है:-

निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।

क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।।

अर्थात : अर्थात् विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।

।।गर्भस्याSSधानं वीर्यस्थापनं स्थिरीकरणं

यस्मिन्येन वा कर्मणा तद् गर्भाधानम्।।

गर्भ बीज और आधान= स्थापना। सतेज और दीर्घायु संतान के लिए यथाविधि और यथा समय बीज की स्थापना करनी चाहिए। इसके लिए स्त्री की उम्र कम से कम प्रथम रजोदर्शन से तीन वर्ष बाद की होना चाहिए। इस प्रकार से भली प्रकार से पुष्ट पुरुष की उम्र कम से कम 19 से अधिक होना चाहिए।

गर्भधान विवाह के चौथे दिन करना चाहिए, परंतु उस दिन यथा योग्य समय होना चाहिए। स्त्रियों का यथोक्त ऋतुकाल अर्थात गर्भधान करने का समय रजोदर्शन से 16 दिन तक की अवधि का होता है।
 

आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभिः समन्वितौ।

स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुतोडपि तादृशः।।

अर्थात : स्त्री और पुरुष जैसे आहार-व्यवहार तथा चेष्टा से संयुक्त होकर परस्पर समागम करते हैं, उनका पुत्र भी वैसे ही स्वभाव का होता है।
 

गर्भधारण के बाद क्या करें?

 

माता के गर्भ में आने के बाद से गर्भस्थ शिशु को संस्कारित किया जा सकता है। महर्षि चरक के अनुसार मन का प्रसन्न और पुष्ट रहना गर्भधारण के लिए आश्यक है इसलिए स्त्री एवं पुरुष को हमेशा उत्तम भोजन करना चाहिए और सदा प्रसन्नचित्त रहना चाहिए। गर्भ की उत्पत्ति के समय स्त्री और पुरुष का मन उत्साह, प्रसन्नता और स्वस्थ्यता से भरा होना चाहिए।

जब तक स्त्री गर्भ को धारण करके रखती है तब तक उसे धार्मिक किताबें पढ़ना चाहिए। आध्यात्मिक माहौल में रहना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा रचनात्मक कार्य करना चाहिए। ऐसा काई कार्य न करें जिसमें तनाव और चिंता का जन्म होता हो। गर्भ में पल रहा बच्चा मां की आवाज और मां के मन को संवेदना के माध्यम से सुनता और समझता है। माता जितना खुद को शांत रखते हुए रचनात्मक कार्यों में अपना समय लगाएगी बच्चा उतना ही समझदार और शांत चित्त का होगा।

यदि बच्चे की परवरिश गर्भ में अच्छे से हो गई तो उसका संपूर्ण जीवन भी अच्छे से गुजरेगा। अत: यह याद रखना चाहिए की गर्भ से लेकर 7 वर्ष की उम्र तक बच्चा जो भी सिखता है वहीं उसकी जिंदगी की नींव होती है। नींव को मजबूत बनाएंगे तो आपके बच्चे का भविष्य उज्जवल होगा।

तो इस प्रकार से गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है। यदि आप इससे संबंधिक अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क करें।

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