Shradh Pooja Mythological Reason Mahabharat - जानें महाभारत के कर्ण और श्राद्ध पूजन का पौराणिक महत्व - Myjyotish News Live
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जानें महाभारत के कर्ण और श्राद्ध पूजन का पौराणिक महत्व

Myjyotish Expert Updated 29 Aug 2020 12:34 PM IST
shradh Pooja
shradh Pooja - फोटो : Myjyotish

प्रतिवर्ष आश्विन मास में पूर्णिमा से ही श्राद्ध आरंभ हो जाते है। इन्हें 16/ सोलह श्राद्ध भी कहते हैं। इस वर्ष पितृपक्ष के श्राद्ध 1 सितम्बर से 17 सितम्बर के बीच रहेंगे।  पितृपक्ष के दौरान वैदिक परंपरा के अनुसार ब्रह्म वैवर्त पुराण में यह निर्देश है कि इस संसार में आकर जो सद्गृहस्थ अपने पितरों को श्रद्धा पूर्वक पितृपक्ष के दौरान पिंडदान, तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है, उनको इस जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते हैं। वह उच्च शुद्ध कर्मों के कारण अपनी आत्मा के भीतर एक तेज और प्रकाश से आलोकित होते है। 

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मृत्यु के उपरांत भी श्राद्ध करने वाले सदगृहस्थ को स्वर्गलोक, विष्णुलोक और ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। वैसे तो बहुत सी कथाएँ है त्रेतायुग और द्वापर युग की जिसमें श्राद्ध का ज़िक्र है।  परन्तु इन में सबसे लोकप्रिय है कर्ण से जुड़ी श्राद्ध महत्व की कथा। 

कथा के अनुसार, महाभारत के दौरान, कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुंची तो उन्हें बहुत सारा सोना और गहने दिए गए। कर्ण की आत्मा को कुछ समझ नहीं आया, वह तो आहार तलाश रहे थे।
 
उन्होंने देवता इंद्र से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना क्यों दिया गया। तब देवता इंद्र ने कर्ण को बताया कि उसने अपने जीवित रहते हुए पूरा जीवन सोना दान किया लेकिन अपने पूर्वजों को कभी भी खाना दान नहीं किया। तब कर्ण ने इंद्र से कहा उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनके पूर्वज कौन थे और इसी वजह से वह कभी उन्हें कुछ दान नहीं कर सकें। 

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इस सबके बाद कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया गया और 16 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, जहां उन्होंने अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध कर उन्हें आहार दान किया। तर्पण किया, इन्हीं 16 दिन की अवधि को पितृ पक्ष कहा गया है ।

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