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श्राद्ध पूजा 2020 : क्या है विशेष, जानें मान्यता

Myjyotish Expert Updated 23 Aug 2020 11:10 AM IST
श्राद्ध पितृपक्ष पूजा 2020
श्राद्ध पितृपक्ष पूजा 2020 - फोटो : Myjyotish
पितरों के प्रति कृत्यागत दर्शाने का उन्हें याद करने का हिंदु धर्म व अन्य धर्मों में एक कर्म किया जाता हैं जिसे श्राद्ध कहते हैं। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के 15 दिनों का समय पूर्वजों एवं पितरों का समय होता है। श्राद्ध से जुड़ी बहुत सी मान्यताएं हैं , इन दिनों लोग अपने पितरों को याद कर उन्हें पूजते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार , पितरों को मृत्युलोक में तब तक जगह नही मिलती जबतक उनका तर्पण न किया जाए । कहा जाता है कि पितृ प्रसन्न न हो तो पितृ दोष का श्राप भोगना पड़ता है । ग्रंथों के अनुसार भगवान से पहले पितरों की पूजा आवश्यक माना गया हैं । कहा जाता है की यदि पितृ प्रसन्न है तो ईश्वर भी प्रसन्न रहते हैं । यह भी कहा जाता है कि इन दिनों सभी पूर्वज पृत्वी पर सुक्ष्म रूप में आकर उनके लिए किए गए तर्पण को घरण करते हैं। पितृ कौन होतें है ?
पितृ परिवार के वो लोग है जिनकी मृत्यु हो चुकी हैं , विवाहिता-अविवाहित,बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष। कहा जाता है की जब पितरों को शांति मिलती है तो घर का वातावरण भी कुशल रहता है। पितृ घर की खुशहाली देखते है और बिगड़ते काम भी बनाते है । अगर उनकी अनदेखी की जाए तो वो रुष्ट भी जाते है और बनते काम भी बिगड़ जाते हैं । 

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इस वर्ष श्राद्ध पर क्या है विशेष ?
हर साल विश्व प्रसिद्ध मेले, यानी की पितृ मेले का आयोजन होता है, परंतु इस वर्ष कोरोना के चलते ऐसा नही होगी । सितंबर में लगने वाले इस मेले को बिहार सरकार ने जनहित के लिए इस वर्ष स्थगित कर दिया है। इस वर्ष नवरात्रि भी श्राद्ध के तुरंत बाद नही है बल्कि 1 महीने बाद है। ज्योतिषियों की माने तो कई सौ साल बाद ऐसा संजोग बना हैं कि लीप ईयर और अधिक मास साथ - साथ अनुभव किया गया हैं।

यदि श्राद्ध की तिथि याद न हो तो 
शास्त्रों में यह विधान है कि यदि किसी को अपने पितरों, पूर्वजों के देहावसान की तिथि ज्ञात नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इसलिए इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसके अलावा यदि किसी परिजन की अकाल मृत्यु हुई हो यानि यदि वे किसी दुर्घटना का शिकार हुए हों या फिर उन्होंनें आत्महत्या की हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी एवं माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है।
 

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