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जानिए शरद पूर्णिमा कब मनाई जाती है और इसका महत्व क्या होता है

My Jyotish Expert Updated 17 Oct 2021 03:37 PM IST
shrad purnima
shrad purnima - फोटो : google
शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा अथवा किसानी पूर्णिमा भी कहते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार अश्विनी मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार पूरे साल में केवल इसी दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। शरद पूर्णिमा के दिन समुद्र मंथन से चंद्रमा,भगवती, आदिशक्ति,श्री महालक्ष्मी और अमृत कलश, शरद धन्वंतरी देवता प्राकट्य हुआ था। समुद्र मंथन से शरद पूर्णिमा के दिन भगवती आदिशक्ति मां लक्ष्मी के प्राकट्य के बाद इसी दिन उनका भगवान श्री विष्णु से पुनः विवाह हुआ था।हिंदू धर्म में कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इस दिन श्री कृष्ण महारास रचाया था एवं मान्यता है कि इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखने का विधि विधान है।


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हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि काफी खास स्थान रखती है और प्रत्येक मास की पूर्णिमा का अपना अलग-अलग महत्व माना जाता है लेकिन कुछ पूर्णिमा बहुत ही श्रेष्ठ मानी गई है। अश्विनी माहिती पूर्ण वालों में से एक मानी जाती है क्योंकि इसे सर्वोत्तम कहा जाता है। अश्विनी मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं और इस पूर्णिमा पर रात्रि में जागरण करने पर रात भर चांदनी रात में रखी खीर को सुबह भोग लगाकर खाया जाता है इसलिए इसे कोजागर पूर्णिमा कहते हैं।
 

कथा-
एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली,तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।तब छोटी बहन बोली, यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है।उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, माता लक्ष्मी और भगवा विष्णु की पूजा का विधान है।कहते हैं ये दिन इतना शुभ और सकारात्मक होता है कि छोटे से उपाय से बड़ी-बड़ी विपत्तियां टल जाती हैं।पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इसी दिन मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था इसलिए धन प्राप्ति के लिए भी ये तिथि सबसे उत्तम मानी जाती है।

इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे।
धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें।तत्पश्चात भक्तिपूर्वक ग़रीबों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा किसी दीन दुःखी को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।

इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं। 



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