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क्या शनि के साढ़े साती का कहर , बच्चों पर भी करता है असर !

My jyotish expert Updated 13 Aug 2021 09:36 PM IST
शनि के साढ़े साती का कहर
शनि के साढ़े साती का कहर - फोटो : Google
न्याय के देवता माने जाते है भगवान शनि। भगवान शनि के नाम से ही लोग डर जाते है। अधिक लोग ऐसा मानते है शनि के प्रभाव से उन्हें केवल परेशानी ही मिल सकती है। ज्योतिष शास्त्र इस बात का खंडन करते हुए बताते है कि शनि देव न्याय के देवता माने जाते है। वो हमें हमारे द्वारा किये गए कर्मों के ही फल देते है। उनके द्वारा दिए गए फल सीधे तौर पर इस पर निर्भर करते है कि हमने कैसे कर्म किए है। अगर हमारे द्वारा अच्छे कर्म किए गए है तो हमें अच्छा फल ही मिलेगा और दूसरी तरफ अगर हमसे कोई गलत काम हुआ है तो शनिदेव उसका उचित दंड भी देते है। लेकिन कई बार शनि देव के कारण लोगों को अप्रत्यशित लाभ होता है।
शनि ग्रह की  स्तिथि बदलती रहती है, आपको बता दें अभी शनि ग्रह मकर राशि में विराज मान है। शनि  ग्रह की साढ़े साती एक राशि से दूसरे राशि पर चढ़ती उतरती रहती है। अभी मकर ,धनु ,और कुम्भ राशि वालों पर शनि की साढ़े साती चल रही है , तो दूसरे तरफ तुला और मिथुन राशि वालों पर शनि की ढैया चल रही है।

शनि के साढ़े साती के प्रकोप से बचने के लिए लोग हर संभव प्रयास करते है। ऐसे ही शनि के साढ़े साती के संदर्भ में एक रोचक सवाल सामने आया है। क्या बच्चों पर भी शनि देव की कठोर दृष्टि पड़ती है? क्या बच्चों के लिए शनि देव की न्याय प्रणाली अलग है। ज्योतिष शास्त्र में इसका उत्तर बताया गया है।

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ऐसा माना जाता है कि जब युद्ध के समय देवताओं को वज्र के लिए महृषि दधीचि की आवश्यकता पड़ी तो, देवता गण के आग्रह पर महृषि मान गए अपने अस्थियों का दान करने के लिए। इस बात का जब उनकी धर्मपत्नी सुवर्चा को पता लगा तो वो बहुत विचलित हो गईं ,फिर उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर कि , उन्हें भी अपने स्वामी के साथ सती होना है। महृषि की पत्नी सुवर्चा उस वक़्त गर्भवती थी , उनके ऐसा कहने पर आकशवाणी हुई कि सुवर्चा के गर्भ से ही महृषि दधीचि के शंकर अवतार का जन्म होगा। ऐसा सुनने के बाद माता सुवर्चा रुक गई , लेकिन अपने पुत्र के जन्म के बाद वो सती हो गई।

जन्म के बाद उस बालक का नाम पड़ा ऋषि पिप्पलाद। चूँकि इस बालक का जन्म पीपल के पेड़ के नीचे ही हुआ था और वो इसी पेड़ के फल खा कर बड़े हुए थे। अपने बचपन में ही अपने माता पिता के सुख से वंचित होने के कारण ऋषि पिप्पलाद को बहुत कष्टों का सामना करना पड़ा। ऋषि ने कठोर तप किया और अपने तप , लग्न से भगवान शिव से वरदान प्राप्त किया। भगवान महादेव से उन्हें ब्रह्मा दंड का वरदान मिला।


अपने जीवन में माता -पिता को ना पाकर उन्होंने सभी देवताओं से सवाल किए की आखिर ऐसा क्या कारण था कि उन्हें बचपन में ही अनाथ होना पड़ गया। ऋषि पिप्पलाद ने देवताओं से प्रश्न किए कि उन्हें किस पाप की इतनी बड़ी सजा मिली है। आखिर में जब ऋषि को ज्ञात हुआ की उनके साथ ऐसा शनिदेव के प्रकोप के वजह से हुआ है तो वह बहुत क्रोधित हुए शनि देव पर।

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क्रोध में आकर ऋषि पिप्पलाद ने वरदान में प्राप्त ब्रह्मा दंड से शनिदेव को दंड दिया और कहा कि कोई ऐसा इतना कठोर कैसे हो सकता है कि एक बच्चे को भी अपने प्रकोप की दृष्टि से दूर नहीं रख पाए। ऐसा माना जाता है ऋषि पिप्पलाद के श्राप के कारण शनि देव का एक पैर कमजोर हो गया था। दूसरी तरफ सभी देवी देवता ऋषि पिप्पलाद को समझाने में लगे थे की शनि देव तो न्याय के देवता है। हमारे कर्मो के अनुसार ही हमें फल देते है। उनके साथ जो भी हुआ वो किसी कर्म के कारण ही हुआ होगा।
 देवताओं के समझाने के बाद ऋषि पिप्पलाद का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने शनि देव को क्षमा कर दिया। लेकिन शनि देव से यह भी प्रार्थना की अब से 16 वर्ष तक के किसी भी बच्चे पर शनि देव की क्रूर दृष्टि नहीं पड़ेगी तथा जो भी पीपल के वृक्ष की पूजा करेंगे उनको भी शनिदेव परेशान नहीं करेंगे।

तब से ऐसी मान्यता है बच्चों पर शनि की साढ़े साती और ढैया का असर नहीं होता है। पीपल के वृक्ष की पूजा करने वालों को शनि देव के प्रकोप से राहत मिलती है।

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