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शनि के तेल अभिषेक से दूर होती है साढ़े साती की दशा

MyJyotish Expert Updated 12 May 2020 07:21 PM IST
Sati's oil gets away from consecration
शनि देव सूर्य देव और माता छाया के पुत्र हैं। जन्म से ही उनके अपने पिता के संबंध ठीक नहीं है। वह बालावस्था से ही महादेव की कठोर तप व अर्चना करते थे क्योंकि वह नवग्रहों में सर्व श्रेष्ठ बनना चाहते थे। महादेव के आशीर्वाद से शनि की शक्ति अन्य ग्रहों से बहुत अधिक मानी जाती है। शनि देव न्याय के देव माने जाते हैं। वह किसी भी व्यक्ति को उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। यदि कर्ता के कार्य अच्छे होते हैं तो उन्हें शुभ फल की प्राप्ति होती है और यदि कर्ता के कार्य ठीक नहीं हैं तो उन्हें कर्म के अनुसार दंड प्रदान किए जाते हैं। शनि के शुभ -अशुभ प्रभावों का एक व्यक्ति के जीवन पर बहुत गहरा असर होता है इसलिए एक सुखद जीवन की इच्छा रखने के लिए शनि देव का प्रसन्न रहना बहुत आवश्यक है।

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पौराणिक मान्यताओं की एक कथा के अनुसार सूर्य देव की अर्धांगिनी एवं शनि देव की माता छाया भगवान शिव की बहुत बड़ी उपासक थी। जब शनि देव उनके गर्भ में थे तब वह शिव की अर्चना में पूर्ण रूप से लीन थीं। वह तप में इतनी समर्पित थीं की उन्होंने खाना - पीना सब छोड़ दिया था और पूर्ण रूप से शिव की दिन रात पूजा करती थीं। इसका असर शनि देव के शरीर को ध्वस्त बनाता गया और उनके शरीर का रंग अंधकार समान काला पड़ गया। जब उनका जन्म हुआ तो सूर्य देव ने उनका रंग देखकर अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया एवं माता छाया का घोर अपमान करने लगे। इसी बात से शनि देव अपने पिता के विरोधी बन गए और सदैव ही उनसे बलशाली होकर अपनी माता के अपमान का बदला लेने के लिए शिव की उपासना करने लगे थे।

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शनि देव की कुदशा जिस पर पड़ गयी उसके जीवन का सर्वनाश हो जाता है। शनि देव सभी दिशाओं से उसका सुख -चैन छीन लेते हैं। शनि की दशा आसानी से समाप्त नहीं होती है। उनके कुप्रभावों का विनाश करने के लिए उन्हें प्रसन्न रखना बहुत आवश्यक है। इसलिए शनिवार के दिन उनका सरसों के तेल से अभिषेक करना चाहिए इससे वह प्रसन्न होते हैं और उनके भक्तों पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। उनके शुभ प्रभावों से व्यक्ति के समस्त दुखों का नाश होता है और व्यक्ति के घर में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं रहती। उसके घर में धन - संपत्ति का वास होता है।

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