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रुक्मिणी अष्टमी, जानिए इसका महत्व और पूजा विधि

My Jyotish Expert Updated 27 Dec 2021 04:26 PM IST
Rumini Ashtami
Rumini Ashtami - फोटो : google
रुक्मिणी अष्टमी, जानिए इसका महत्व और पूजा विधि
रुक्मिणी अष्टमी का पर्व पौष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. 27 दिसंबर सोमवार के दिन रुक्मिणी अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा. अष्टमी तिथि देवी रुक्मिणी के जन्म से संबंधित है अत: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी की पूजा की जाती है.  देवी रुक्मिणी को माँ लक्ष्मी का ही अम्श स्वरुप भी माना गया है पौराणिक गमान्यताओं के अनुसार श्री कृष्ण की सभी मुख्य भार्याओं में से एक रुक्मिणी जी भी थी जो उन्हें अत्यंत प्रिय थी और उनके जन्म दिवस का समय अत्यंत ही भक्ति भाव से मनाए जाने की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. रुक्मिणी अष्टमी पर्व लोक परंपराओं में सदैव मौजूद रहा और ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियां अपने सौभाग्य में वृद्धि हेतु देवी रुक्मिणी का आशिर्वाद लेती है. इनकी पूजा द्वारा दांपत्य एवं संतान सुख का वरदान प्राप्त होता हैं. 

रुक्मिणी अष्टमी पर्व
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी की विधि-विधान से पूजा करने पर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. श्री कृष्ण व राधा जी की ही भांति अष्टमी तिथि के दिन हुआ था और श्रीकृष्ण पत्नी बनीं तथा उन्हें उनका पूर्ण स्नेह प्राप्त होता है. हिन्दू धर्म में रुक्मिणी अष्टमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान द्वारा आर्थिक उन्नती एवं समृद्धि का वर प्राप्त होता है. इसके अतिरिक्त संतान व वैवाहिक जीवन भी शुभता को प्राप्त करता है. रुक्मिणी का विवाह श्री कृष्ण के साथ होने का उल्लेख महाभारत में भी प्राप्त होता है. अविवाहित स्त्रियां यदि इस दिन सच्चे मन से भगवान श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी की पूजा-अर्चना करती हैं तो उन्हें भी अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का अधिकार प्राप्त होता है तथा जीवन में मान सम्मान की भी प्राप्ति होती है.

रुक्मिणी अष्टमी का महत्व
अष्टमी तिथि बेहद शुभ होती है. इस दिन जो भी जातक भगवान श्री कृष्ण, देवी रुक्मिणी और उनके पुत्र प्रद्युम्न की विधि-विधान से पूजा करने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं. इस दिन भक्त प्रात:काल समय उठकर स्नान करने के उपरांत पूजा का संकल्प लेते हैं इस दिन व्रत रखने का भी विधान बताया गया है. बाद पूजा स्थल को गंगा जल से पवित्र करें आसन मण्डप स्थल या चौकी को रख कर उस पर श्री कृष्ण व देवी रुक्मिनी जी की प्रतिमा अथवा चित्र को स्थापित करना चाहिए. भगवान श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी का अभिषेक करना चाहिए. श्रीकृष्ण जी को पीतांबरी वस्त्र तथा देवी रुक्मिणी को लाल वस्त्र एवं सौभाग्य दायक वस्तएं अर्पित करनी चाहिए. श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी को चंदन का तिलक लगाना चाहिए तथा सुंगंधित वस्तुओं और हल्दी व पुष्प द्वारा पूजा करनी चाहिए. देवी लक्ष्मी के मंत्रों का उच्चारण करने से आर्थिक क्षेत्र में शुभता प्राप्त होती है इसके साथ विष्णु स्त्रोत का पाठ करना चाहिए. तुलसी मिश्रित भोग अर्पित करना चाहिए. संध्या में पुन: भगवान श्रीकृष्ण और मां रुक्मिणी का पूजन करना चाहिए तथा पूजन का संकल्प पूरा होने के पश्चात ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए तथा सामर्थ्य अनुसार दान कार्य करना 
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