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विधि विधान से मनाएं रक्षाबंधन का त्यौहार, बढ़ेंगे भाई बहन के रिश्तो में प्यार।

My jyotish expert Updated 14 Aug 2021 03:58 PM IST
Rakshabandhan 2021
Rakshabandhan 2021 - फोटो : Google
रक्षा बंधन "शब्द" दो शब्दों के मिलने से बना है, “रक्षा” तथा “बंधन“। संस्कृत भाषा के अनुसार, इस शब्द का मतलब होता है की “एक ऐसा बंधन जो की रक्षा प्रदान करता हो”। रक्षा शब्द का मतलब रक्षा प्रदान करना तथा “बंधन” का मतलब एक गांठ, जो की रक्षा प्रदान करे। ये त्यौहार केवल खून के रिश्ते को ही नहीं स्पष्ट करता बल्कि ये एक पवित्र रिश्ते को भी जताता है। यह त्यौहार भाई बहन को खुशी प्रदान करने वाला त्यौहार है, वही ये भाइयों को ये भी याद दिलाता है की उन्हें अपने बहनों की हमेशा रक्षा करनी हैं। ये पर्व भाई को अपने बहन के प्रति कर्तव्य को जाहिर करता है। इसे केवल सगे भाई बहन ही नहीं बल्कि कोई भी स्त्री एंव पुरुष जो की इस पर्व की मर्यादा को समझते या मानते है वो इसका अनुपालन कर सकते हैं। इस अवसर पर, एक बहन अपने भाई के कलाई पर राखी बांधती है साथ ही वो भगवान से ये मांगती है की उसका भाई हमेशा खुश रहे एंव स्वस्थ रहे। वही भाई भी अपने बहन को बदले में कोई तौफा(gift) प्रदान करता है साथ में वो भी ये प्रतिज्ञा करता है की कोई भी विपत्ति आ जाये वो  बहन की रक्षा हमेशा करेगा, एंव भगवान से अपने बहन ही लम्बी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की मनोकामना भी करता है। इस त्यौहार का पालन कोई भी कर सकता है  चाहे वो सगे भाई बहन हो या नही। ईश्वर से यह पर्व श्रावण माह के पूर्णिमा के दिन मनाया जाएगा। यह त्यौहार अक्सर अगस्त महीने में ही पड़ता है। सभी त्योहारों के जैसे रक्षा बंधन को मनाने की भी एक विधि होती है जिसका अनुपालन करना बहुत आवश्यक होता है, तो आइयें इस विषय में विस्तार से जानते हैं:

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"रक्षाबंधन" की सुबह जल्दी उठकर स्नान कर ले। इससे मन तथा शरीर दोनों पवित्र हो जाते है। उसके बाद भगवान की पूजा की जाती है एंव पुरे घर को साफ कर चारों ओर गंगा जल का छिडकाव किया जाता है। फिर राखी की थाली सजाये मतलब रक्षाबधंन के इस पवित्र त्याहार के दिन पीतल की थाली मे ऱाखी ,चंदन ,दीपक ,कुमकुम, हल्दी,चावल के दाने नारियल एंव मिठाई रखे। अब अपने भाई को बुलाये तथा उन्हें एक साफ़ स्थान बैठाये। "अब शुरू होती है राखी बांधने की विधि"। 
*सबसे पहले थाली मे रखे दीये को जलाये, तत्पश्चात बहन भाई के माथे पर तिलक चन्दन लगाती है। फिर भाई की आरती करे ,उसके बाद अक्षत फेंकती हुई मन्त्रों का उच्चारण करे, फिर भाई के कलाई पर राखी बांधें। अब  बहन भाई को मिठाई खिलाती है, अगर भाई बड़ा हुआ तब बहन उसके चरण स्पर्श करती है और भाई छोटा हुआ तब भाई को करना होता है। अब भाई अपने बहन के लिए लाए तौफा प्रदान करता है। जो की बहन को खुशी-खुशी ग्रहण कर लेनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात ,जब तक राखी की विधि पूरी न हो, तब तक दोनों भाई बहन को भूखा रहना पड़ता है। इसके पश्चात ही राखी का रस्म पूर्ण होता है।

रक्षाबंधन का इतिहास

सभी पर्व की तरह रक्षाबंधन मनाने के पीछे भी एक इतिहास है। चलिए ऐसे ही कुछ रक्षा बंधन मनाने के पीछे कहानियों को जानते:

*देवों के राजा इन्द्रदेव की कहानी

भविस्य पुराण के अनुसार जब असुरों के राजा बाली ने देवताओं पर आक्रमण किया था। तब राजा इंद्र को काफी क्षती पहुंची थी।
अपने पति कि ऐसी अवस्था  देखकर पत्नी सची से रहा नहीं गया।तब  वो विष्णु जी के पास गयी इसका समाधान प्राप्त करने हेतू।तब भगवान विष्णु जी ने एक धागा सची को प्रदान किया और कहा की वो इस धागे को जाकर अपने पति के कलाई पर जाकर बांध दें। जब सची ने ऐसा किया तब इंद्र के हाथों राजा बलि की पराजय हो गई। इसलिए पुराने युग में युद्ध में जाने से पूर्व राजा एंव उनके सैनिकों के हाथों में उनकी पत्नी तथा बहनें राखी बांधा करती थी। ताकि वो सकुशल घर जीत कर लौट आये।

*माता लक्ष्मी और महादानी राजा बलि की कहानी

असुर सम्राट बलि बहुत ही बड़ा भक्त भगवान विष्णु का था। बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जी ने बलि के राज्य की रक्षा स्वयं करनी शुरू कर दी। इसे देख माता लक्ष्मी परेशान होने लगी,क्यूंकि विष्णु जी अब वैकुंठ में नहीं रहने लगे। तब मां लक्ष्मी जी ने एक ब्राह्मण औरत का रूप धारन कर बलि के महल में रहने लगी। बाद में उन्होंने राजा बलि के हाथों में राखी बांध दी एंव बदले में बलि को कुछ देने को कहा। परंतु बलि को ये नहीं पता था की वो औरत माता लक्ष्मी है। इसलिए, महादानी राजा बलि ने उन्हें  कुछ भी मांगने का अवसर दिया। राजा बलि द्वारा कुछ भी मांगने को कह जाने पर माता लक्ष्मी ने बलि से विष्णु जी को उनके साथ वापस वैकुंठ लौट जाने का आग्रह किया। चूँकि बलि ने पहले ही देने का वादा कर दिया था, इसलिए राजा बलि को भगवान विष्णु को वापस लौटना पड़ा। इसलिए रक्षाबंधन के त्यौहार को  बहुत से स्थान फर बलेव्हा भी कहा जाता है।

* भगवान कृष्ण तथा "पांचाली" अर्थात द्रौपधी की कहानी

लोगों की रक्षा करने हेतू भगवान कृष्ण को दुष्ट राजा शिशुपाल को मारना पड़ा। इस युद्ध के दौरान कृष्ण जी की अंगूठी में गहरी चोट लग गई। जिसे देखकर पांचाली ने अपने वस्त्र का उपयोग कर उनके खून बहने को रोक दिया।
कृष्ण को द्रौपधी की इस कार्य से काफी प्रसन्नता हुई तथा उन्होंने उनके साथ एक भाई बहन का अटूट रिश्ता निभाया। बहुत वर्षों के बाद जब युधिष्ठिर को द्रौपधी को कुरु सभा में जुए के खेल में हारना पड़ा। तब, धृतराष्ट्र पुत्र अर्थात कौरवों के राजकुमार दुहसासन ने द्रौपधी का चिर हरण करने लगा। उस पल भगवान कृष्ण ने ही द्रौपधी की रक्षा करी थी और उनके सम्मान पर आंच नहीं आने दी।

आर्थिक संकट और अन्य मुसीबतों का निवारण करने हेतु रक्षा बंधन के दिन करें ये उपाय

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