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जानें कब है राधा अष्टमी, क्या है इस दिन का महत्व व व्रत विधि

My jyotish expert Updated 03 Sep 2021 07:15 PM IST
राधा अष्टमी 2021
राधा अष्टमी 2021 - फोटो : Google
भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधा अष्टमी मनाई जाती है। शास्त्रों में इस तिथि को राधा जी का प्राकट्य दिवस माना जाता है। हमेशा कृष्ण जी के पहले राधा जी का नाम लिया जाता है। भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी के बाद राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। जन्माष्टमी का व्रत तभी पूरा होता है जब राधा अष्टमी का व्रत पूरा किया जाता है। राधारानी को मोक्ष देने वाली, सौम्य, जगतजननी माना जाता है। जिस तरह वो संयमित एवं संतुष्ट रही उनकी भक्ति से ये गुण उनके भक्तों में भी आते हैं।

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कब और क्यों मनाई जाती है राधा अष्टमी

यह पर्व जन्माष्टमी के 15 दिन बाद उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष राधा अष्टमी का पर्व 14 सितम्बर, मंगलवार को मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार राधा जी के पिता का नाम वृषभानु और माता का नाम कीर्ति था। राधा जी स्वयं मां लक्ष्मी का अंश थी। इस दिन व्रत करने से पापों का नाश होता है। सुख समृद्धि और संतान प्राप्ति के लिए भी ये व्रत रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि राधा अष्टमी का व्रत करने पर ही जन्माष्टमी का व्रत पूरा होता है। घर में लक्ष्मी जी का वास होता है सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि राधा जी का जन्म गर्भ से नही बल्कि वृषभानु जी की यज्ञभूमि पर हुआ था। अधिकांश शास्त्रों में उनका प्राकट्य दोपहर को माना जाता है। इसी दिन राधा जी का भव्य श्रृंगार कर के विधि विधान से पूजन किया जाता है। राधा जी की भक्ति करने से उनके साथ भगवान कृष्ण का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

ऐसे करें राधारानी की पूजा
  •  प्रातःकाल उठकर स्नान कर लें और स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। 
  •  अब एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर राधा कृष्ण की मूर्ति स्थापित करें और मध्य भाग में मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित करें। 
  •  पंचामृत से स्नान करा के राधाकृष्ण का श्रृंगार करें और सहृदय पूजा करें। 
  •  राधाकृष्ण के मंत्रों का जाप करें और आरती गाएं। 
  •  अष्टमी के अगले दिन स्त्रियों और ब्राह्मणों को भोजन करायें एवं श्रद्धानुसार दान करें। 
  •  जन्माष्टमी का व्रत राधाष्टमी के व्रत के बिना पूर्ण नही होता है।
  •  राधारानी के इन मंत्रों का करें जाप-

तप्त-कांचन गौरांगी श्री राधे वृन्दावनेश्वरी, वृषभानु सुते देवी प्रणमामि हरिप्रिया।

ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै नमः

ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै विद्यहे गांधविरकायै विधीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात।

श्री राधा विजयते नमः, श्री राधाकृष्णाय नमः


राधा अष्टमी शुभ मुहूर्त 

राधा अष्टमी 13 सितम्बर दोपहर 3 बजकर 10 मिनट से 14 सितम्बर की दोपहर 1 बजकर 9 मिनट तक रहेगी।  

उम्र में कान्हा से बड़ी थी राधा जी
पुराणों में उम्र को लेकर अलग अलग उल्लेख मिलता है। कहीं 5 साल तो कहीं 11 महीने का अंतर बताया गया है। पद्मपुराण के अनुसार राधा जी का जन्म बरसाने में हुआ था और जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था तो जन्मोत्सव में राधा जी अपने परिवार के साथ नंदगांव आई थी, तब वो 11 महीने की थी। कुछ पुराणों में राधा कृष्ण के बीच उम्र का अंतर 5 साल बताया गया है। माना जाता है कि जब कंस के अत्याचार से बचने के लिए जब नंद बाबा वृंदावन चले गए थे तो वहीं श्रीकृष्ण और राधारानी की लीलाएं होती थी। उम्र का अंतर  भले अलग हो लेकिन सभी जगह राधारानी को श्रीकृष्ण से बड़ा बताया गया है।

क्यों नही हो पाए एक दूसरे के राधा कृष्ण

जब भी प्यार की मिसाल दी जाती है तो राधाकृष्ण का नाम लिया जाता है, पर ऐसा क्या था जो राधा कृष्ण का मिलन नही हो पाया। राधा से सच्चे प्रेम के बाद भी जीवनसाथी के रूप में कृष्ण ने रुक्मणि को चुना। उनकी 8 पत्नियों के जिक्र मिलता है पर उनमें राधा जी का नाम नही है। कई पुराणों में भी राधा जी का जिक्र नही है। कहा जाता है कि इसके पीछे किसी और का नही बल्कि श्रीकृष्ण के प्रिय मित्र सुदामा का दिया हुआ श्राप था। श्रीकृष्ण और राधा गोलोक में एक साथ निवास करते थे। एक बार कृष्ण विरजा नाम की गोपिका के संग विहार कर रहे थे तभी राधा आ गईं उन्होंने दोनों को अपमानित किया। राधा जी ने गोपिका को धरती पर दरिद्र ब्राह्मण बनकर दुखी जीवन व्यतीत करने का श्राप दिया। वहीं सुदामा ने उन्हें बरसों तक कृष्ण से विरह का श्राप दिया। कहते हैं जब राधा ने कृष्ण से पूछा कि हमारा विवाह क्यों ना हुआ तो कृष्ण ने कोई जवाब नही दिया। राधा ने फिर क्रोध में सवाल पूछा कृष्ण पीछे मुड़े और वो राधा के भेष में थे। तब उनको समझ आया कि कृष्ण ही राधा है और राधा ही कृष्ण है। ये प्रेम कहानी भले अधूरी है पर अमर है।

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