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Mundan Sanskar: मुंडन संस्कार से बढ़ती है शिशु की आयु और होता है तेज का विकास, जानें महत्व

Nisha Thapaनिशा थापा Updated 16 Jun 2024 01:19 PM IST
मुंडन संस्कार का महत्व
मुंडन संस्कार का महत्व - फोटो : My Jyotish

खास बातें

Mundan Sanskar: मुंडन संस्कार 16 संस्कारों की सूची में आठवां संस्कार है। इस संस्कार के माध्यम से शिशु के सिर का मुंडन किया जाता है और उसके सिर में एक शिखा रखी जाती है। तो आइए जानते हैं कि इस संस्कार का क्या महत्व है। 
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Mundan Sanskar: हमारी सनातन संस्कृति में शिशु के बाल उसके जन्म के बाद के कुछ सालों तक नहीं काटे जाते हैं। चूड़ाकरण संस्कार, जिसे मुंडन संस्कार भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में शिशु के जीवन का एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार में, शिशु के सिर के केश यानि बालों को पहली बार काटा जाता है, यानि कि शिशु का मुंडन किया जाता है। उसे शिखा (चोटी) धारण कराया जाता है। इसके पीछे धार्मिक कारण तो है ही, साथ में वैज्ञानिक कारण भी है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो जन्म के एक साल तक शिशु का शरीर बेहद ही कोमल होता है, जिसके कारण उसके सिर में बाल काटने के लिए किसी प्रकार की धातु नहीं लगाई जाती है और साथ ही उसके बाल बहुत ही छोटे होते हैं। तो आइए जानते इस लेख में जानते हैं कि इसका महत्व क्या है और मुंडन संस्कार का सही समय क्या है।
 

मुंडन संस्कार का महत्व


मुंडन संस्कार, 16 संस्कारों की सूची में आठवां संस्कार है। इस संस्कार में में शिशु के सिर का मुडंन किया जाता है और उसके सिर में एक शिखा रखी जाती है और उसे चूड़ा कहा जाता है, इसलिए इसे चूड़ाकर्म संस्कार भी कहा जाता है। माना जाता है कि माता के गर्भ में आये हुए बाल अशुद्ध होते हैं। इस संस्कार से सिर के रोमछिद्र खुल जाते हैं और मलीनता दूर हो जाती है। इस संस्कार से मस्तिष्क की सुरक्षा होती है, बल, आयु और तेज का विकास होता है, तथा घने और मजबूत बाल उगते हैं। शिखा धारण करने से तेज, बल और आयु में वृद्धि होती है और सद्बुद्धि, सद्वृत्ति, पवित्रता और सद्विचारों की वृद्धि होती है।
 

मुंडन संस्कार का समय


चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मत:।
प्रथमेब्दे तृतीये वा कर्तव्यं श्रुतिचोदनात्।। (मनुस्मृति 2।34)


मनुस्मृति के अनुसार शिशु के जन्म के पहले या तीसरे वर्ष में यह संस्कार किया जाना उपयुक्त होता है।
महर्षि आश्वलायन एवं बृहस्पति के अनुसार यह संस्कार तृतीय, पंचम, सप्तम, दशम एवं एकादश वर्ष में भी किया जा सकता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार यह संस्कार कुल परम्परा के अनुसार भी किया जा सकता है।
 

मुंडन संस्कार की विधि

  • इस संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त का चुनाव किया जाता है।
  • यज्ञ मंडप सजाया जाता है और देवी-देवताओं का पूजन किया जाता है।
  • बालक को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं।
  • ब्राह्मण मंत्रोच्चार करते हुए बालक के सिर के बाल मुंडन करते हैं।
  • मुंडन के बाद बालक को फिर से स्नान कराया जाता है।
  • शिखा धारण कराकर बालक को आशीर्वाद दिया जाता है।
  • दान-पुण्य का कार्य किया जाता है।

तो, इस प्रकार से आप अपने शिशु का शुभ मुहूर्त में मुंडन संस्कार करवा सकते हैं। यदि आप इससे संबंधिक अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्या आपकी सहायता कर सकते हैं। 
 
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