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Home ›   Blogs Hindi ›   Matsya Jayanti: Mastya incarnation of Lord Vishnu is worshipped

Matsya Jayanti मत्स्य जयंती पर्व जब होती है भगवान विष्णु के मस्त्य अवतार की पूजा

Acharya Rajrani Sharma Updated 11 Apr 2024 10:02 AM IST
Matsya Jayanti
Matsya Jayanti - फोटो : myjyotish

खास बातें

Matsya Jayanti Puja मत्स्य जयंती का त्योहार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया समय मनाया जाता है. भगवान श्री विष्णु के मत्स्य की जयंती देश भर में भक्ति भाव से मनाई जाती है. दक्षिण भारत में इस मत्स्य जयंती त्यौहार की अलग ही रंगत देखने को मिलती है.
 
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Matsya Jayanti Puja मत्स्य जयंती का त्योहार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया समय मनाया जाता है. भगवान श्री विष्णु के मत्स्य की जयंती देश भर में भक्ति भाव से मनाई जाती है. दक्षिण भारत में इस मत्स्य जयंती त्यौहार की अलग ही रंगत देखने को मिलती है.

Matsya Jayanti Significance: श्री विष्णु भगवान के मत्स्य अवतार पर के दिन मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना होती है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन बारे में कहा जाता है कि प्रभु श्री हरि सत्य युग के दौरान मछली के रूप में भगवान विष्णु का पहला स्वरुप रहा. 

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मत्स्य अवतार में भगवान एक सींग वाली मछली के रुप में प्रकट होते हैं. इस अवतार में महाप्रलय के दौरान जीवन को बचाने हेतु भगवान अवतरित होते हैं. मत्स्य जयंती का उत्सव चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के दौरान तृतीया तिथि यानी तीसरे दिन मनाई जाती है. यह उत्सव शुभ चैत्र नवरात्रि दिन की अवधि के बीच आता है. आइये जानें भगवान के मत्स्य अवतार की कथा और पूजा.
इस दिन भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की पूजा की जाती है. साथ ही इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है. 
 

मत्स्य जयंती भगवान विष्णु अवतार की पूजा 

मत्स्य जयंती चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु के मत्स्य स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है. मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के दशावतार में पहला अवतार है. इस रूप में प्रकट होकर श्रीहरि ने सृष्टि को विनाश से बचाया और वेदों को पुनः प्राप्त किया.इस वर्ष मत्स्य जयंती 11 अप्रैल 2024 को पड़ रही है. इस दिन सुबह से शाम तक का समय पूजा के लिए शुभ रहेगा. मत्स्य जयंती पर श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है. लेकिन इसके साथ ही मत्स्य जयंती के दिन किए जाने वाले कुछ विशेष कार्य भी बताए गए हैं. ये काम करने से भगवान प्रसन्न होते हैं.

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भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार क्यों लिया?

ऐसा माना जाता है कि मत्स्य भगवान विष्णु का पहला अवतरण था, जिसमें उन्होंने एक विशाल मछली का रूप धारण किया था. यह त्योहार मुख्य रूप से कुछ कथाओं से संबंधित रहा है, एक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने एक सींग वाली मछली का रूप लिया और मनु को बाढ़ के बारे में चेतावनी दी, उन्होंने एक जहाज बनाने, सभी पौधों के बीज इकट्ठा करने, एक जोड़ा लाने के लिए कहा. सप्तऋषियों के साथ-साथ प्रत्येक जीवित प्राणी को बाढ़ आने पर समुद्र के किनारे मिलने के लिए कहा. जब बाढ़ आने लगी तो भगवान विष्णु ने जहाज को अपने सींग से बांध कर उसका मार्गदर्शन किया और उन सभी को बचाया. जबकि, दूसरी कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने अपने मत्स्य रूप में वेदों को गहरे समुद्र में छुपाने वाले राक्षस दमनक को मारकर भगवान ब्रह्मा की मदद की थी.
दशावतार को भगवान विष्णु के दस अवतारों के रूप में जाना जाता है और मत्स्य को पहला अवतार माना जाता है जिसका जन्म सत्ययुग में हुआ था.

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श्री दशावतार स्तोत्र Dashavtar Stotram: Pralay Payodhi Jale)


प्रलय पयोधि-जले धृतवान् असि वेदम्
विहित वहित्र-चरित्रम् अखेदम्
केशव धृत-मीन-शरीर, जय जगदीश हरे

क्षितिर् इह विपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे
धरणि- धारण-किण चक्र-गरिष्ठे
केशव धृत-कूर्म-शरीर जय जगदीश हरे

वसति दशन शिखरे धरणी तव लग्ना
शशिनि कलंक कलेव निमग्ना
केशव धृत शूकर रूप जय जगदीश हरे

तव कर-कमल-वरे नखम् अद्भुत शृंगम्
दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृंगम्
केशव धृत-नरहरि रूप जय जगदीश हरे

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छलयसि विक्रमणे बलिम् अद्भुत-वामन
पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन
केशव धृत-वामन रूप जय जगदीश हरे

क्षत्रिय-रुधिर-मये जगद् -अपगत-पापम्
स्नपयसि पयसि शमित-भव-तापम्
केशव धृत-भृगुपति रूप जय जगदीश हरे

वितरसि दिक्षु रणे दिक्-पति-कमनीयम्
दश-मुख-मौलि-बलिम् रमणीयम्
केशव धृत-राम-शरीर जय जगदीश हरे

वहसि वपुशि विसदे वसनम् जलदाभम्
हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभम्
केशव धृत-हलधर रूप जय जगदीश हरे

नंदसि यज्ञ- विधेर् अहः श्रुति जातम्
सदय-हृदय-दर्शित-पशु-घातम्
केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे

म्लेच्छ-निवह-निधने कलयसि करवालम्
धूमकेतुम् इव किम् अपि करालम्
केशव धृत-कल्कि-शरीर जय जगदीश हरे

श्री-जयदेव-कवेर् इदम् उदितम् उदारम्
शृणु सुख-दम् शुभ-दम् भव-सारम्
केशव धृत-दश-विध-रूप जय जगदीश हरे

वेदान् उद्धरते जगंति वहते भू-गोलम् उद्बिभ्रते
दैत्यम् दारयते बलिम् छलयते क्षत्र-क्षयम् कुर्वते
पौलस्त्यम् जयते हलम् कलयते कारुण्यम् आतन्वते
म्लेच्छान् मूर्छयते दशाकृति-कृते कृष्णाय तुभ्यम् नमः
 
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