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मंदार पर्वत: क्यों जुड़ा है समुद्र मंथन से मंदार पर्वत का रहस्य

Myjyotish expert Updated 19 May 2021 10:03 AM IST
Astrology
Astrology - फोटो : Google

हिन्दू धर्म में मंदार पर्वत का बहुत ही बड़ा धार्मिक महत्व है। मंदार पर्वत का उल्लेख पौराणिक कथाओं एवं धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय मंदार पर्वत पर वासुकी नाग को लपेटकर देवताओं और असुरों ने मंथन के समय पर्वत को मथानी की तरह और नाग को रस्सी की तरह उपयोग किया  था। जिसकी छाप आज भी पर्वत पर धारदार लकीरों के रूप में देखने को मिलती है। जो तकरीबन एक दूसरे से  6 फिट की दूरी पर यहाँ आज भी बनी हुई है। यह लकीरें मानव निर्मित बिल्कुल भी नहीं लगती। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से यह निशान बने थे। जो आज हजारों- लाखों लोगों के आस्था का केंद्र सदियों से बना हुआ है।

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1. यह पर्वत लगभग 700 फिट की ऊँचाई वाला एक छोटा सा पर्वत है। जिसे मंदार हिल के नाम से भी जाना जाता हैं।

2. यह पर्वत बिहार राज्य के बांका जिले के बौंसी गांव में स्थित है।जिसकी दूरी बौंसी से 5km की दूरी पर स्थित है यह भागलपुर से 35km की दूरी पर स्थित है। जहाँ रेल, बस इत्यादि किसी भी वाहन से सुविधापूर्वक जाया जा सकता है। 

3. यह पर्वत हिन्दू के साथ साथ जैन धर्म के अनुयायी के लिए भी एक आस्था का केंद्र है।

4. पौराणिक कथाओं में इस पर्वत को काफी विशेष महत्व दिया गया है।

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5. जनआस्था का मानना है कि समुद्र मंथन के बाद भगवान शंकर ने जिस महाशंख से विष पान किया था वो आज भी पर्वत के उपर शंखकुण्ड में एक विशाल शंख की आकृति मौजूद हैं।

6. यह पर्वत आस्था के साथ साथ पर्यटक स्थल भी हैसाथ ही गुप्त काल की सैकड़ों प्राचीन मुर्तिया है। जिसे पर्वत के चट्टानों पर उत्कीर्ण की गई हैं। जिसे देखने रोज हजारों की संख्या में लोग दूर-दूर से आते हैं।

7. लोकमान्यता ये भी है कि इस पर्वत की तलहटी पर एक पापहरणी तालाब स्थित है। जिसमे स्नान करने के लोगों को कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती हैं ।

8.  लोग मकर संक्रांति के दिन इस तालाब में अवशय स्नान करते है। उसके बाद भगवान मधुसूदन की पूजा अर्चना करते हैं फिर दही- चूड़ा ओर तिल के लड्डू  विशेष रूप से खाये जाते हैं।  यहाँ 14जनवरी ( मकरसंक्रांति) को हर साल की         तरह विशाल मेले का आयोजन होता है। जो तकरीबन15 दिनों तक चलता है। जिसे बौंसी मेले के नाम से जाना जाता है। बौंसी मेले को राजकीय मेले का भी दर्जा भी प्राप्त है।

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