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सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की कथा, जानें आरती का समय एवं पूजा विधि !

Myjyotish Expert Updated 23 Feb 2021 04:41 PM IST
Somnath jyotirling
Somnath jyotirling - फोटो : Myjyotish
सोमनाथ मंदिर जो कि 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रमुख ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ मंदिर गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्थापित है यहीं भगवान् श्रीकृष्ण ने जरा नामक व्याध के बाण को निमित्त बनाकर अपनी लीला का संवरण किया था।  
सोमनाथ की कथा:
 

पुराणों की माने तो दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएं थीं। उन सभी का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था। किंतु चंद्रमा का समस्त अनुराग व प्रेम उनमें से केवल रोहिणी के प्रति ही रहता था। उनके इस कृत्य से दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याएं बहुत अप्रसन्न रहती थीं। उन्होंने अपनी यह व्यथा-कथा अपने पिता को सुनाई। दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्रदेव को अनेक प्रकार से समझाया।
 
किंतु रोहिणी के वशीभूत उनके हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंततः दक्ष ने क्रोधित होकर उन्हें 'क्षयग्रस्त' हो जाने का शाप दे दिया। इस शाप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गए। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वी पर सुधा-शीतलता वर्षण का उनका सारा कार्य रूक गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। चंद्रमा भी बहुत दुखी और चिंतित थे। उनकी प्रार्थना सुनकर इंद्रादि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण उनके उद्धार के लिए पितामह ब्रह्माजी के पास गए। सारी बातों को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- 'चंद्रमा अपने शाप-विमोचन के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र प्रभासक्षेत्र में जाकर मृत्युंजय भगवान् शिव की आराधना करें।

उनकी कृपा से अवश्य ही इनका शाप नष्ट हो जाएगा और ये रोगमक्त हो जाएंगे।उनके कथनानुसार चंद्रदेव ने मृत्युंजय भगवान् की आराधना का सारा कार्य पूरा किया। उन्होंने घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जप किया। इससे प्रसन्न होकर मृत्युंजय-भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वर प्रदान किया। उन्होंने कहा- 'चंद्रदेव! तुम शोक न करो। मेरे वर से तुम्हारा शाप-मोचन तो होगा ही, साथ ही साथ प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी।
 

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 कृष्णपक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, किंतु पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी। इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण चंद्रत्व प्राप्त होता रहेगा।' चंद्रमा को मिलने वाले इस वरदान से सारे लोकों के प्राणी प्रसन्न हो उठे। सुधाकर चन्द्रदेव पुनः दसों दिशाओं में सुधा-वर्षण का कार्य पूर्ववत् करने लगे।
 
शाप मुक्त होकर चंद्रदेव ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर मृत्युंजय भगवान् से प्रार्थना की कि आप माता पार्वतीजी के साथ सदा के लिए प्राणों के उद्धारार्थ यहाँ निवास करें। भगवान् शिव उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके ज्योतर्लिंग के रूप में माता पार्वतीजी के साथ तभी से यहाँ रहने लगे।
 
सोमनाथ मंदिर के द्वार के खुलने का समय और द्वार के बंद होने का समय:
 

सोमनाथ मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोल दिए गए थे। मंदिर में 10 साल से कम और 60 साल से ज्यादा उम्र के भक्तों को प्रवेश के लिए मनाही थी। मंदिर में प्रवेश के लिए सुबह 7:30 बजे से 11:30 बजे और दोपहर 12:30 बजे से शाम 6:30 बजे तक का समय रखा गया है। भगवान सोमनाथ की आरती प्रात: 7.00 बजे, मध्यान्ह 12.00 बजे और संध्या 7.00 बजे होती है।
 
श्री सोमनाथ का मेला हर वर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक लगता है। श्रावण माह में प्रतिदिन भीड़ रहती है, परंतु सोमवार को भारी भीड़ रहती है। श्री सोमनाथ जी के मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। सरकार द्वारा ट्रस्ट को भूमि, बगीचा आदि देकर आय का प्रबंधन किया गया है। यज्ञ, रुद्राभिषेक पूजा, विधान वगैरह विद्वान पंडितों के द्वारा सम्पन्न होता है।

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