Lohri Festival :know The Special Things About Lohari - जानिए लोहड़ी पर्व की खास बातें और इससे जुड़ी कहानी - Myjyotish News Live
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जानिए लोहड़ी पर्व की खास बातें और इससे जुड़ी कहानी

Anurag VatsAnurag Vats Updated 13 Jan 2020 03:52 PM IST
Lohri festival :Know the special things about Lohari
लोहड़ी के त्योहार का हमारे देश में विशेष महत्व है। यह पंजाब के साथ-साथ पूरे उत्तर भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लोहड़ी का यह पर्व हर साल मकर संक्राति के एक दिन पहले आता है। लोहड़ी के पर्व को नई फसल की बुवाई या कटाई आने पर इसे खुशियों के साथ मनाया जाता है। इस साल लोहड़ी 13 जनवरी को है। जबकि इसके दो दिन बाद पूरे देश में मकर संक्राति का पर्व मनाया जाएगा। लोहड़ी के दिन आग जलाकर उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और गजक चढ़ाई जाती है। इसके साथ ही सभी लोग आग के चारों और चक्कर लगाते हुए अपने खुशहाल जीवन के लिए कामना करते हैं। लोहड़ी की खास बात यह है कि इसमें संगीत और नृत्य भी किया जाता है, जिससे ये त्योहार और भी कई सारे रंगों से भर जाता है।  
आखिर क्यों मनाते हैं लोहड़ी?
 
लोहड़ी के अवसर पर नई फसल के आने पर पंजाब में इसकी पूजा करने की परंपरा है। इसके अलावा देश के कई हिस्सों में लोहड़ी पर्व का खास महत्व है। यह त्योहार पूस की आखिरी रात्रि और माघ महीने की पहली सुबह की कड़क ठंडी को कम करने के लिए मनाया जाता है। पारंपरिक तौर पर फसल की बुवाई-कटाई से जुड़ा यह एक विशेष त्योहार है।
 
‘दुल्ला भट्टी’ कहानी का क्या है महत्व?
 
इस त्योहार में लोग दुल्ला भट्टी की कहानी को सुनाते हैं। साथ ही आग के चारों और चक्कर लगाते हुए नाचते-गाते हैं। लोहड़ी के अवसर पर दुल्ला भट्टी की कहानी को सुनने का बहुत महत्व है। दरअसल इसकी एक कहानी यह है कि जब मुगल काल में अकबर महान राजा थे तब दुल्ला भट्टी पंजाब में ही रहता था। कहते हैं कि दुल्ला भट्टी ने पंजाब की बेटियों की उस समय रक्षा की थी, जब संदल बाजार में बेटियों को अमीर सौदागरों के हाथों बेचा जाता था। वहीं एक दिन दुल्ला भट्टी ने बड़ी होशियारी से इन सौदागरों के चंगुल से सभी बेटियों को छुड़वाया। फिर बाद में उनकी शादी हिन्दू लड़कों से करवाई थी। उसके बाद से ही दुल्ला भट्टी को एक नायक की उपाधि से सम्मानित किया जाने लगा। इसलिए लोहड़ी के मौके पर हर साल ये कहानी सुनाई जाने लगी।
 
कैसे उत्पन्न हुआ ‘लोहड़ी’ शब्द?
 
ऐसा माना जाता है, कि लोहड़ी  का यह शब्द ‘लोई’ यानी (संत कबीरदासजी की पत्नी) के नाम से उत्पन्न हुआ है। वहीं कई सारे लोग यह भी मानते हैं कि यह शब्द ‘तिलोड़ी’ से उत्पन्न हुआ है, जो बाद में लोहड़ी शब्द के रूप में हो गया। इसके साथ ही कुछ लोगों का मानना हे कि लोहड़ी का यह शब्द ‘लोह’ यानी चपाती बनाने के लिए प्रयुक्त एक उपकरण से उत्पन्न हुआ है।
 
 
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