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काँवड़ यात्रा की शुरुआत कैसे और कब हुई, जानिए इनके नियम व महत्व

Myjyotish expert Updated 17 Jul 2021 05:27 PM IST
Kanwar Yatra Rules Significance
Kanwar Yatra Rules Significance - फोटो : Google
Kanwar Yatra 2021 -  भगवान शंकर जी का प्रिय(favorite) मास (month) सावन कुछ ही दिनों में प्रारंभ (start) होने वाला है। इस पवित्र मास में हिंदू सनातन धर्म के शिव भक्त,  भगवान शिव जी की विधि विधान से पूजा(worship) करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस माह में शंकर भगवान जी का अभिषेक का बहुत फलदाई (fruitful) होता है इसलिए लोग सावन मास में रुद्राभिषेक कराते हैं। भगवान शिव की आराधना के लिए सावन माह सबसे उत्तम माह माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार सावन माह का प्रारम्भ आषाढ़ पूर्णिमा के साथ होता है। इस वर्ष सावन का महीना 25 जुलाई दिन रविवार से प्रारंभ होने वाला है तथा 22 अगस्त दिन रविवार (sunday) को समाप्त होगा। इस मास में भगवान शिव जी के भक्त कावड़ यात्रा में जाते हैं। यह यात्रा कावड़ियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण (important) होती है। लेकिन कोरोना महामारी की वजह से यह यात्रा करने में काफी दुविधा बनी हुई है। काँवड़ लेकर पैदल यात्रा ( on foot) करके गंगाजल लेने जाते हैं। यह यात्रा सबसे कठिन होती है। इस यात्रा(journey) में भक्त,  काँवड़ को ना तो जमीन में रखता है और ना ही टांगता है। अगर कांवरिये को भोजन, पानी करना है या आराम करना है तो वह अपने कांवड़ को किसी और को दे देगा, पेड़ पर टांग देगा या तो कोई स्टैंड(stand) में रखेगा। कांवर चढ़ाने वालों को ही कावड़िया कहा जाता है। यह कावड़िया केसरी रंग का वस्त्र पहनते हैं। अधिकतर लोग(mostly people) प्रयागराज, हरिद्वार, गोमुख या गंगोत्री जैसे तीर्थस्थलों से गंगा के जल को भरते हैं। इसके बाद वह पैदल यात्रा कर गंगाजल को शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।

काँवड़ यात्रा का इतिहास (history of kanwad yatra):

कावड़ यात्रा का प्राचीन इतिहास भगवान परशुराम से जुड़ा है। भगवान परशुराम शिव जी के भक्त थे। मानते हैं कि उन्होंने कांवड़ लेकर उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के समीप "पुरा महादेव" गए और गढ़मुक्तेश्वर से गंगा के जल को लेकर भगवान शिव को जलाभिषेक किया था। उस वक्त सावन मास ही चल रहा था। तब से सावन मास में कांवड़ यात्रा करने की परंपरा की शुरुआत हो गई और उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत अन्य राज्य में शिव भक्त हर वर्ष सावन के दिनों में कांवड़ यात्रा निकालते हैं।

काँवड़ यात्रा तीन प्रकार की होती है:

1. खड़ी काँवड़ यात्रा
2. झांकी काँवड़ यात्रा
3. डाक काँवड़ यात्रा


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काँवड़ यात्रा करने के लिए करना होगा यह नियम का पालन:


1. लोग कहते हैं कि काँवड़ की यात्रा करना बहुत ही कठिन है और इनके नियम भी बेहद सख्त हैं। जो भी व्यक्ति नियमों का पालन (follow the rules) नहीं करता उनकी कावड़ यात्रा अधूरी मानी जाती है।

2. कांवड़ यात्रा जब किया जाता है तो किसी भी तरह का नशा(addiction) नहीं करना चाहिए।

 3. काँवड़ यात्रा के वक्त मांस मदिरा(meet licker) व तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।

4. कावड़ यात्रा के वक्त पैदल ही चलने का विधान है। अगर आप कोई भी फल या मन्नत पूरी होने के बाद यात्रा करते हैं तो उसी मन्नत( vow) के अनुसार ही यात्रा करें।

5. इस यात्रा में काँवड़ को चर्म(foreskin)से संबंधित कोई वस्तु को नहीं छूना चाहिए।

6. काँवड़ को चारपाई व खटिया का प्रयोग करना भी वर्जित है।

7. काँवड़ यात्रा के दौरान कोई साज-सज्जा या श्रृंगार  का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

8. इस यात्रा में भक्त,  काँवड़ को ना तो जमीन में रखता है और ना ही टांगता(hang) है। अगर कांवरिये को भोजन पानी करना है या आराम(rest) करना है तो वह अपने कांवड़ को किसी और को दे देगा या तो कोई स्टैंड में रखेगा।

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