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Krishna Janmashtami 2020: किसका अहंकार मिटाने हेतु हनुमान बने थे श्री कृष्ण के सहायक

Myjyotish Expert Updated 10 Aug 2020 02:08 PM IST
जन्माष्टमी 2020: हनुमान बने थे श्री कृष्ण के सहायक
जन्माष्टमी 2020: हनुमान बने थे श्री कृष्ण के सहायक - फोटो : Myjyotish

जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था तो सभी देव नंदगाँव उनके दर्शन गए थे। भगवान शनि भी उनमें से एक थे। सभी को भगवान कृष्ण के दर्शन करने की अनुमति थी लेकिन शनिदेव को उन्हें शीग्र ही देखना था। सभी देवी - देवताओं को बारी  - बारी से भीतर जाना था परन्तु शनिदेव अपने बल एवं शक्ति का उपयोगकर जल्द से जल्द कान्हा जी को देखना चाहतें थे। जैसा की हम सभी जानतें है की श्री कृष्ण तो लीलाधर है और उनकी महिमा अपरम्पार है। उन्होंने हनुमान जी को शनिदेव को बाहर ही रोकने की आज्ञा दी। तब हनुमान जी और शनिदेव में भीषण युद्ध हुआ और उन्होंने शनिदेव को तब तक अंदर नहीं जाने दिया जब तक की उनकी बारी नहीं आ गयी। जब शनिदेव अंदर गए तो कान्हा जी ने अपने वास्तव स्वरुप में आकर उन्हें समझाया की बल एवं अहंकार से जीवन में सुख की प्राप्ति नहीं होती है। जब जिसकी किस्मत में जो होगा वह उसे अवश्य ही मिल जाएगा।

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इसी से जुड़ी एक और कथा है जिसमें माँ यशोदा ने शनिदेव का रूप देखकर उन्हें भीतर जाने से मना कर दिया था। उनका मानना था की शनिदेव का स्वरुप देखकर कान्हा जी भयभीत हो जाएंगे। यशोदा माँ के इस वचन को सुनकर शनि देव निराश हो गए और पास के जंगल में जाकर तपस्या करने लगे। थोड़े समय के बाद भगवान कृष्ण जंगल में उनके सामने आए और उनसे पूछा, “क्या समस्या है। आप जंगल में क्यों हैं? ” शनि देव ने उत्तर दिया, “हे भगवान! कृपया मुझे एक बात बताएं, जब मैं लोगों को उनके काम (कर्म) के अनुसार दंड देने का काम कर रहा हूं। फिर लोग मेरे बारे में क्यों सोचते हैं कि मैं निंदनीय और क्रूर हूं। क्यों लोग सोचते हैं कि शनि देव ही मुसीबत पैदा करते हैं। वह मेरी छाया से भी क्यों बचते हैं? आज भी जब सभी भगवान आपके दर्शन का आनंद ले सकते हैं, मुझे इस अधिकार और प्रतिबंध से इनकार किया जाता है। ”

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भगवान कृष्ण ने शनिदेव को नंदनवन के पास रहने की सलाह दी। उन्होंने शनिदेव को यह वरदान भी दिया कि जो कोई भी प्रार्थना करने के लिए उनके मंदिर में आएगा वह तुरंत सभी चिंताओं और कष्टों से मुक्त हो जाएगा। अंत में, भगवान कृष्ण ने मंदिर का दौरा किया और दिव्य बांसुरी बजाना शुरू किया। बाँसुरी की आवाज़ सुनकर गोपियाँ आ गईं लेकिन कृष्ण ने खुद को कोयल के रूप में बदल दिया था । वन का वह स्थान जहाँ कृष्ण शनिदेव के सामने प्रकट हुए थे, तब से उसे  "कोकिलवन" कहा जाता है। अब यह "कोकिलावन शनिधाम" के नाम से प्रसिद्ध मथुरा का एक मंदिर है।

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