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Home ›   Blogs Hindi ›   How did the Jagannath Rath Yatra start, know why this temple of Puri is so special

Jagannath Rath Yatra 2024: जगन्नाथ रथ यात्रा की कैसे हुई शुरुआत, जानें क्यों है पुरी का यह मंदिर इतना खास

Nisha Thapaनिशा थापा Updated 08 Jul 2024 01:30 PM IST
जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई
जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई - फोटो : My Jyotish

खास बातें

Jagannath Rath Yatra 2024: जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरूआत पौराणिक काल में ही हो चुकी है। रथ यात्रा का उल्लेख पद्म पुराण समेत कई ग्रंथों में मिलता है। तो आइए इस लेख के जरिए जानते हैं कि जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई और मंदिर इतना खास क्यों है।
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Jagannath Rath Yatra 2024: जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत हो चुकी है और प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि से जगन्नाथ रथ यात्रा प्रारंभ होती है। यह रथ यात्रा ओडिशा के पुरी में निकाली जाती है, जिसमें लाखों की संख्या में भक्तजन रथ यात्रा का हिस्सा बनने के लिए पहुंचते हैं। क्योंकि कहा जाता है कि जो व्यक्ति रथ यात्रा के मात्र दर्शन भी कर लेता है, उन्हें 100 यज्ञ के बराबर का फल मिलता है। तो आइए इस लेख में जानते हैं कि रथ यात्रा कैसे शुरू हुई। 
 

जगन्नाथ मंदिर क्यों है खास ( Jagannath mandir kyu hai khas)

 

हमारे पूरे भारत में वैसे तो सभी मंदिर बहुत ही खास हैं, लेकिन इन्हीं में से 4 मंदिर ऐसे हैं, जो देश के विभिन्न कोनों में है। 4 मंदिरों में जगन्नाथ जी का मंदिर भी शामिल है और बाकी के तीन मंदिरों में दक्षिण में रामेश्वरम, हिमालय में बद्रीनाथ और पश्चिम में द्वारका है। जगन्नाथ जी का यह मंदिर इसलिए भी खास है, क्योंकि यहां पर भगवान श्री कृष्ण, बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम जी की प्रतिमाएं एक साथ हैं और तीनों की पूजा की जाती है और यह एकमात्र ही ऐसा मंदिर है जहां पर तीनों की एक साथ पूजा होती है।
 

मौसी से घर से भी जुड़ी है रथ यात्रा की कहानी (Rath Yatra kaise shuru huyi)

 

जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान भगवान अपनी मौसी के घर गुंडिचा जाते हैं और इसके पीछे पौराणिक महत्व भी है। मन्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि जब जगन्नाथ जी की छोटी बहन सुभद्रा जी ने नगर भ्रमण की इच्छा जाहिर की, तो जगन्नाथ जी अपने भाई बलराम जी के साथ बहन सुभद्रा को लेकर नगर की यात्रा के लिए निकल गए और इस यात्रा के दौरान वह अपने मौसी के घर गुंडिचा भी जाते हैं और सात दिनों तक रूकते हैं और बात का जिक्र पद्म पुराण, नारद पुराण और ब्रह्मपुराण में भी किया गया है। इसके बाद कहा जाता है कि मौसी के घर पर उन्हें कई प्रकार के पकवान खिलाए जाते हैं और फिर भगवान पकवान खाने से बीमार पड़ जाते हैं, जिसके बाद उनके स्वस्थ्य होने पर भगवान जी के दर्शन किए जाते हैं। इसी के बाद से रथ यात्रा क परम्परा का शुभांरभ हुआ और तीनों भाई -बहन की रथ यात्रा निकाली जाती है।

 
 

तीनों रथों के नाम


जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान तीनो भाई भहनों के रथ निकलते हैं, जिसमें सबसे आगे भाई बलराम जी का रथ जिसे ताल ध्वज कहा जाता है, दूसरे में बहन सुभद्रा जी का रथ, जिसे पद्म ध्वज कहते हैं और आखिरी में जगन्नाथ जी भगवान श्री कृष्ण जी का ध्वज जिसे गरूण ध्वज कहा जाता है।

तो इस प्रकार से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा प्रारंभ हुई। यदि आप इससे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क करें।

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