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Home ›   Blogs Hindi ›   Gupt Navratri: Ways to please Mahavidya Kali during the first Gupt Navratri

Gupt Navratri: गुप्त नवरात्रि, प्रथम महाविद्या काली को प्रसन्न करने का उपाय

Acharya RajRani Updated 06 Jul 2024 10:01 AM IST
गुप्त नवरात्रि
गुप्त नवरात्रि - फोटो : myjyotish

खास बातें

first Mahavidya Kali : गुप्त नवरात्रि के पहले दिन होती है माता काली की पूजा। प्रथम महाविद्या काली को प्रसन्न करने का यह सबसे उत्तम समय भी माना जाता है। gupt navratri के दिन पर की गई माँ काली की उपासना दूर करती हर संकट। 
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first Mahavidya Kali : गुप्त नवरात्रि के पहले दिन होती है माता काली की पूजा। प्रथम महाविद्या काली को प्रसन्न करने का यह सबसे उत्तम समय भी माना जाता है। gupt navratri के दिन पर की गई माँ काली की उपासना दूर करती हर संकट। 

gupt navratri puja vidhi गुप्त नवरात्रि बहुत विशेष होते हैं और इनका पूजन भी सामान्य से अलग होता है। इनमें से प्रथम महाविद्या काली की पूजा में सभी बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है। माता की गणना उग्र देवियों में की जाती है। आइये जान लेते हैं आज के दिन माता के स्त्रोत से कैसे प्रसन्न होती है देवी काली। 

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गुप्त नवरात्रि के दिन माँ काली पूजन विशेष Special worship of Maa Kali on the day of Gupt Navratri


देवी काली का पूजन पहले दिन घटस्थापना से होता है। देवी के समक्ष शुद्ध चित्त मन से उपासना की जाती है। इस पूजा को गुप्त रुप से किया जाता है तथा साधना में किसी भी प्रकार की गलती स्वीकार नहीं होती है। धर्मग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख किया गया है जो इस प्रकार हैं।

काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी। भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा। बगला सिद्ध विद्या च मातंगी कामलात्मिका। एता विद्या महेशानी महाविद्या प्रकीर्तिता। काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला यह सभी तंत्र की देवियों में स्थान पाती हैं। इसी कारण से इनकी साधना होती है विशेष। 

देवी स्त्रोत का पाठ देता है संपूर्ण लाभ Recitation of Devi Strot gives complete benefit

 सात्विक रुप से भक्तों के लिए इस दिन किया जाने वाला स्त्रोत सभी प्रकार से से देवी का आशीर्वाद दिलाने वाला होता है। 

॥ भवान्यष्टकम् स्त्रोत ॥
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥1॥

भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसार-पाश-प्रबद्धः सदाऽहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥2॥

न जानामि दानं न च ध्यान-योगं न जानामि तंत्र न च स्तोत्र-मन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥3॥

न जानामि पुण्यं न जानानि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्ति व्रतं वाऽपि मात-र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥4॥

कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धि कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबंधः सदाऽह गतिस्त्व गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥5॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चाऽन्यत् सदाऽहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥6॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चाऽनले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥7॥

अनाथो दरिद्रो जरा-रोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाऽहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥8॥

॥ इति भवान्यष्टकं संपूर्णम् ॥

यदि आप इससे संबंधित अधिक जानकारी चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क करें।
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