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जानें गुप्त नवरात्रि का धार्मिक महत्व ? इस दौरान पूजन करना क्यों आवश्यक ?

My Jyotish Expert Updated 31 Jan 2022 11:09 AM IST
Gupt navaratri 2022 : गुप्त नवरात्रि के महाउपाय करने से नष्ट होंगी आपकी हर समस्या, जरूर जानिए
Gupt navaratri 2022 : गुप्त नवरात्रि के महाउपाय करने से नष्ट होंगी आपकी हर समस्या, जरूर जानिए - फोटो : google
गुप्त नवरात्रि धार्मिक महत्व 
इस वर्ष 2022 को पहली नवरात्रि साल के दूसरे महीने के दूसरे दिन से 02 फरवरी को आरंभ हो रहे हैं. यह माघ मास के गुप्त नवरात्रि होंगे जो माघ प्रतिपदा को 2 फरवरी, बुधवार के दिन से शुरू होकर 10 फरवरी 2022, बृहस्पतिवार तक संपन्न होंगे. 

ज्योतिष के जानकारों के अनुसार इस बार यानि 2022 में माघ मास की गुप्त नवरात्रि की साधना के लिए घटस्थापना 02 फरवरी 2022 को सुबह 07:09 से 08:31 के मध्य का समय बहुत ही शुभ होगा उस समय पर देवी की स्थापना करना शुभ फल प्रदान करने वाला होगा. 

गुप्त नवरात्रि के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान पश्चात देवी दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर को स्थापित करना चाहिए. देवी की प्रतिमा पर लाल रंग के वस्त्र अर्पित करने चहैए और लाल रंग की चुनरी को अवश्य चढ़ाना चाहिए. एक मिट्टी के बर्तन में जौ के बीजों को बोना चाहिए और कलश में गंगाजल, सिक्का आदि डालकर उस पर आम्रपल्लव और श्रीफल रखकर स्थापित करना चाहिए. देवी को फल-फूल आदि को अर्पित करते हुए विधि-विधान से हर रोज पूजा करनी चाहिए. 

कलश स्थापना से होती है सभी मनोकामनाएं पूर्ण 
नवरात्रि समय पर कलश स्थापना का अत्यंत शुभ प्रभाव माना गया है. कलश में समस्त देवताओं का वास माना गया है. इसी के साथ बोए बीजों को भी शुभ फलप्रद माना जाता है. मिट्टी के बर्तन में बोए बीजों पर हर दिन जल का छिड़काव करते रहने से जीवन संचार की चेतना का विकास होता है. अष्टमी या नवमी के दिन देवी की पूजा के बाद नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है उन्हें पूड़ी, चना, हलवा आदि का प्रसाद खिलाकर कुछ दक्षिण देकर देवी का पूजन संपन्न होता है. गुप्त नवरात्रि के अंतिम दिन देवी दुर्गा की पूजा के बाद देवी दुर्गा की आरती करते हैं तथा पूजा समाप्ति के बाद कलश के जल का घर में छिड़काव किया जाता है जिससे समस्य देवी देवताओं का आशिर्वाद प्राप्त किया जा सके. कलश के जल को किसी पवित्र स्थान एवं वृक्ष पर भी अर्पित किया जाता है. 

सालभर में चार बार आते हैं नवरात्रि 
साल भर में दो गुप्त ओर दो सर्वजन्य द्वारा मनाए जाने वाले नवरात्रि होते हैं. देवी भगवती की उपासना के लिए चार नवरात्रि अत्यंत खास समय होता है. गुप्त नवरात्रि में माता की महाविद्याओं का पूजन होता है ओर सामान्य नवरात्रि में माता के सामान्य नव रुपों का पूजन किया जाता है.  दो गुप्त और दो उदय अर्थात मुख्य नवरात्रि समय पर शक्ति आशिर्वाद प्राप्ति का संकल्प पूर्ण होता है. चैत्र और अश्विन मास की नवरात्रि उदय या मुख्य नवरात्रि के रुप में जाने जाते हैं. आषाढ़ और माघ माह के नवरात्र गुप्त नवरात्रि के रुप में जाने जाते हैं.  गुप्त नवरात्रि मुख्य रूप से उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, और आसपास के इलाकों में खासतौर पर मनाए जाते हैं. इसी के साथ समस्त शक्ति पिठों पर इनका विशेष पूजन होता है. 

गुप्त नवरात्रि: तंत्र साधना 
गुप्त नवरात्रि का समय तंत्र साधना के लिए सबसे उपयुक्त समय होता है. यह समय किसी खास मनोकामना की पूर्ति के लिए भी उत्तम है, किंतु अन्य नवरात्रि की तरह ही इसमें भी व्रत-पूजा, पाठ, उपवास किया जाता है. इस दौरान देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए साधक कई तरह से साधना को अपनाता है. कठोर व्रत एवं दिनचर्या का वहन किया जाता है. इस समय पर दुर्गा चालीसा,दुर्गा सप्तशती पाठ, दुर्गा सहस्त्रनाम पाठ करना शुभदायी होता है. गुप्त नवरात्रि तांत्रिक कियाओं, शक्ति साधनाओं, महाकाल आदि का आशिर्वाद पाने हेतु अत्यंत खास होती है. 

गुप्त नवरात्रि की देवियां
गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं का पूजन होता है इन में मां काली, तारादेवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी माता, छिन्न माता, त्रिपुर भैरवी मां, धुमावती माता, बगलामुखी, मातंगी और देवी कमला प्रमुख देवियों के रुप में पूजी जाती हैं. 

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