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Home ›   Blogs Hindi ›   Doing Trikal Sandhya gives freedom from all troubles and opens the doors of success

Trikal Sandhya: त्रिकाल संध्या करने से सभी संकटों से मिलती है मुक्ति और खुलते हैं सफलता के द्वार

Shaily Prakashशैली प्रकाश Updated 06 Jul 2024 12:02 PM IST
त्रिकाल संध्या का महत्व
त्रिकाल संध्या का महत्व - फोटो : My Jyotish

खास बातें

Trikal Sandhya: त्रिकाल संध्या करने से जातक के जीवन से समस्त संकट दूर होते हैं साथ ही उसे सफलता प्राप्त होती है। तो आइए इस लेख के जरिए जानते हैं कि त्रिकाल संध्या क्या है औ इसका महत्व है और लाभ क्या हैं।
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Trikal sandhya: किसी समय का परिवर्तन काल संधिकाल होता है। जैसे रात के बाद दिन प्रारंभ होता है लेकिन दोनों के बीच जो काल होता है, उसे संधिकाल कहते हैं। दिन और रात मिलाकर 8 संधिकाल होते हैं जिसे अष्ट प्रहर कहते हैं। संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि करने के बाद गायत्री छंद से अपने ईष्ट देव की प्रार्थना की जाती है। हालांकि प्राचीनकाल से ही त्रिकाल संध्या करने का विधान रहा है।  तो आइए जानते हैं कि त्रिकाल संध्या का क्या महत्व है।
 

अष्ट प्रहर कौन से होते हैं?

 

दिन के चार प्रहर:- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल।
रात के चार प्रहर:- प्रदोष, निशिथ, त्रियामा एवं उषा।
त्रिसंध्या करने का समय : उषाकाल, मध्यान्ह और सायंकाल।

1. उषा काल : उषा काल या ब्रह्मा मुहूर्त में पहली संध्या करें। इसका समय है- प्रात: 3:45 से सूर्योदय तक। प्रातः संध्या का मुख्य उद्देश्य सूर्य उपासना या ध्यान करना होता है।
 

उषाकाल त्रिकाल संध्या श्लोक


कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम्।।

 
2. मध्यान्ह काल : इस समय में दूसरी संध्या की जाती है। इसका समय है- दोपहर 11:30 से 12: 30 के बीच। इस समय में बुधवार को छोड़कर हर दिन अभिजीत मुहूर्त रहता है। माध्यानिक संध्या में भगवान विष्णु की पूजा और ध्यान किया जाता है।
 
3. सायंकाल : सूर्यास्त से आधा घंटे पहले और सूर्यास्त के आधे घंटे बाद तक यह तीसरी संध्या होती है। कई लोग सायाह्न सन्ध्या करते हैं यानी सूर्यास्त के आधे घंटे बाद। सायं संध्या के दौरान भगवान शिव की पूजा और ध्यान किया जाता है।
 

नित्य त्रिसंध्या में क्या करते हैं?


1.का उच्चारण 3 बार करें।
2. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।। इस मंत्र को 3 बार जपें।
3. ॐ श्री सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम: ।। (श्री कृष्णाय वयं नम: इसे 3 बार बोलें)
4. इसके बाद माधव नाम 108 बार, दुर्गा माधव स्तुति और विष्णु के 16 नाम स्तोत्र का का वाचन करते हैं।
5. इसके साथ ही यदि समय हो तो दशावतारस्तोत्रम का पाठ भी करते हैं।
 
हिन्दू प्रार्थना को संध्या वंदन कहते हैं। बहुत से लोग नवधा भक्ति अर्थात श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चना, वंदना, मित्र, दाम्य, आत्मनिवेदन की बात करते हैं, लेकिन यह प्रार्थना का एक तरीका है। जिसकी जैसी भक्ति वैसा करता है। जैसे पूजा-आरती, भजन-कीर्तन, ध्यान-साधना, त्रिसंध्या, यज्ञ आदि। इसमें त्रिसंध्या को श्रेष्ठ बताया गया है।
 

दो काल में भी कर सकते हैं संध्या वंदन


पूर्वासंध्या जपंस्तिष्ठन् सावित्रीमर्कदर्शनात् ।
पश्चिमान्तु समासीन: सम्यगृक्षविभावनात् ।। ( मनुस्मृति ३/१०१ )

अर्थात् प्रातःकाल की संध्या में सूर्य दर्शन होने तक गायत्री का जप करें और सांयकाल को भली-भांति तारा दर्शन तक संध्या करें।
 

त्रिकाल संध्या का लाभ


1. त्रिकाल संध्या करने से ओज, आयु, आरोग्य तथा धन-धान्य आदि की वृद्धि होती है।
2. नियमपूर्वक संध्या से करने से सभी जन्मों के पाप कट जाते हैं और आने वाले संकट से व्यक्ति बच जाता है।
3. नित्य संध्या काल की संध्या करने से पापरहित होकर जातक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
4. रात या दिन में जो विकर्म हो जाते हैं, वे त्रिकाल संध्या से नष्ट हो जाते हैं।

तो इस प्रकार से आप त्रिकाल संख्या करके ये लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यदि आपके पास इससे संबंधित कोई सवाल है, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क करें।
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