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Kalimath Temple: राक्षसों का संहार करने के लिए जहां देवी ने 12 साल की कन्या के रूप में लिया था जन्म

myjyotish expert Updated 01 Jun 2021 10:18 AM IST
Kalimath Temple: राक्षसों का संहार करने के लिए जहां देवी ने 12 साल की कन्या के रूप में लिया था जन्म
Kalimath Temple: राक्षसों का संहार करने के लिए जहां देवी ने 12 साल की कन्या के रूप में लिया था जन्म - फोटो : google
भारत में हर धर्मस्थल की अपनी-अपनी मान्यता और लोकप्रियता है। कुछ मंदिर तो ऐसे है जिसकी प्रसिद्धि केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्वभर में है। हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार देवी-देवताओं का वास पहाड़ों में होता है। इसी कारण पहाड़ी राज्य उत्तराखंड को देवभूमि भी कहा जाता है। यहां पर कई मंदिर है जिसके रहस्य आज तक कोई सुलझा नहीं सका है। ऐसा ही एक है रुद्रप्रयाग में सिद्धपीठ कालीमठ मंदिर। जिस पर लोगों की अटूट आस्था है और इसी वजह से हर साल बड़ी संख्या में भक्त कालीमठ मां के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। कालीमठ का मंदिर रुद्रप्रयाग जिले की कालीमठ घाटी में स्थित है। इस मंदिर से आठ किलोमीटर की ऊंचाई पर एक दिव्य शिला है। इस शीला को कालीशिला के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि दानव शुंभ और निशुंभ और रक्तबीज का वध करने के लिए मां काली ने इस स्थान पर 12 साल की बालिका के रूप में जन्म लिया था। जिसके बाद मां ने देवताओं ने राक्षसों से मुक्ति दिलाई थी। क्रोध के कारण मां का शरीर काला पड़ गया। ये मंदिर भारत के प्रमुख सिद्ध और शक्तिपीठों में एक है।

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बिना मुर्ति के होती है मंदिर में पूजा

कालीमठ मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई मूर्ति नहीं है। मंदिर के अंदर एक कुंडी बनी हुई है जिसकी भक्त पूजा करते है। यह कुंड रजतपट श्री यंत्र से ढका हुआ है। केवल पूरे साल में शारदा नावरात्री में अष्ट नवमी के दिन इस कुंड को खोला जाता है और बाहर लाया जाता है। उस कुंड की पूजा केवल मध्यरात्रि में की जाती है। पूजा के लिए केवल पूजारी ही मौजूद रहते है।

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कालीमठ मंदिर के कुछ रोचक तथ्य

कालीमंठ मंदिर विंध्याचल की मां कामख्या और जालंधर की ज्वाला मां के समान ध्यान और तंत्र के लिए अत्यंत ही उच्च कोटि का कहा जाता है। 
मान्यता के अनुसार कालीमठ मंदिर सबसे ताकतवर मंदिरों में से एक माना जाता है। यह केवल ऐसी जगह जहां माता काली अपनी बहनों मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के साथ स्थित है।
स्कंद पुराण में केदारखंड के 62 अध्याय में मां के इस मंदिर का वर्णन है। इस मंदिर की स्थापना शंकराचार्य ने की थी। यहां मां काली ने रक्तबीज राक्षस का संहार किया था। इसके बाद देवी मां इसी जगह पर अंर्तध्यान हो गई थीं। आज भी यहां पर रक्तशिला, मातंगशिला व चंद्रशिला स्थित है। उत्तराखंड का ये वो शक्तिपीठ है, जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती।
कालीमठ मंदिर से 8 किलोमीटर की खड़ी ऊंचाई पर एक दिव्य शिला है जिसे कालीशिला के नाम से जाना जाता है। यहां इस शिला में आज भी देवी काली के पैरों के निशान मौजूद हैं। कालीशीला में देवी के 64 यन्त्र है। मां दुर्गा को इन्ही 64 यंत्रो से शक्ति मिली थी। कहा जाता है कि इस जगह पर 64 योगिनिया विचरण करती रहती हैं।

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