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जानें ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व

Myjyotish Expert Updated 21 Mar 2021 09:30 AM IST
Jyotish shastra
Jyotish shastra - फोटो : Myjyotish
ज्योतिष में सूर्य ग्रह का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म में सूर्य को देवता का स्वरूप मानकर इसकी आराधना की जाती है। यह धरती पर ऊर्जा का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य को तारों का जनक माना जाता है। पृथ्वी से सूर्य की दूरी क्रमशः बुध और शुक्र के बाद सबसे कम है। इसका आकार सभी ग्रहों से बहुत विशाल है। सौर मंडल में यह केन्द्र में स्थित है। यद्यपि खगोलीय दृष्टि से सूर्य एक तारा है। लेकिन वैदिक ज्योतिष में यह एक महत्वपूर्ण और प्रमुख ग्रह है। जन्म कुंडली के अध्ययन में सूर्य की अहम भूमिका होती है।

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हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में सूर्य को देवता माना गया है जिसके अनुसार, सूर्य समस्त जीव-जगत के आत्मा स्वरूप हैं। इसके द्वारा व्यक्ति को जीवन, ऊर्जा एवं बल की प्राप्ति होती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र हैं। माता का नाम अदिति होने के कारण सूर्य का एक नाम आदित्य भी है। ज्योतिष में सूर्य ग्रह को आत्मा का कारक कहा गया है। इसके चिकित्सीय और आध्यात्मिक लाभ को पाने के लिए लोग प्रातः उठकर सूर्य नमस्कार करते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार रविवार का दिन सूर्य ग्रह के लिए समर्पित है जो कि सप्ताह का एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
 
हिन्दू ज्योतिष में सूर्य ग्रह जब किसी राशि में प्रवेश करता है तो वह धार्मिक कार्यों के लिए बहुत ही शुभ समय होता है। इस दौरान लोग आत्म शांति के लिए धार्मिक कार्यों का आयोजन कराते हैं तथा सूर्य की उपासना करते हैं। विभिन्न राशियों में सूर्य की चाल के आधार पर ही हिन्दू पंचांग की गणना संभव है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में गोचर करता है तो उसे एक सौर माह कहते हैं। राशिचक्र में 12 राशियाँ होती हैं। अतः राशिचक्र को पूरा करने में सूर्य को एक वर्ष लगता है। अन्य ग्रहों की तरह सूर्य वक्री नहीं करता है। सूर्य हमारे जीवन से अंधकार को नष्ट करके उसे प्रकाशित करता है। यह हमें सदैव सकारात्मक चीज़ों की ओर प्रेरित करता है। इसकी किरण मनुष्यों के लिए आशा की किरण होती हैं। साथ ही यह हमें ऊर्जावान रहने की प्रेरणा देता है जिससे हम अपने उद्देश्य को पाने के लिए अनवरत रूप से कार्य करते रहे हैं।

ज्योतिष में सूर्य को राजा की पदवी प्रदान की गई है । ज्योतिष के अनुसार सूर्य आत्मा एवं पिता का प्रतिनिधित्व करता है. सूर्य द्वरा ही सभी ग्रहों को प्रकाश प्राप्त होता है ओर ग्रहों की इनसे दूरी या नज़दीकी उन्हें अस्त भी कर देती है। सूर्य सृष्टि को चलाने वाले प्रत्यक्ष देवता का रुप हैं। कुंडली में सूर्य को पूर्वजों का प्रतिनिधि भी माना जाता है। सूर्य पर किसी भी कुंडली में एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने पर उस कुंडली में पितृ दोष का निर्माण हो जाता है. व्यक्ति की आजीविका में सूर्य सरकारी पद का प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति को सिद्धान्तवादी बनाता है. इसके अतिरिक्त सूर्य कार्यक्षेत्र में कठोर अनुशासन अधिकारी, उच्च पद पर आसीन अधिकारी, प्रशासक, समय के साथ उन्नति करने वाला, निर्माता, कार्यो का निरिक्षण करने वाला बनाता है ।

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सूर्य कि कुंडली में मजबूत स्थिति व्यक्ति को कुछ अधिक सशक्त बना देती है । व्यक्ति भावनाओं को नियंत्रण में रखना जानता है कोई भी निर्णय सोच विचार कर ही लेता है भावनाओं में बहकर नहीं लेता अपने निर्णय पर अड़िग रहते हुए कभी कभी कठोर प्रतीत होता है परंतु कई बार लोग इन्हें अभिमानी समझने लगते हैं पर ऎसा नही है. सूर्य का बली होना व्यक्ति में जिम्मेदारियों को उठाने वाले बनाता है ।
 
कुछ राशियों में सूर्य का बल सामान्य से कम हो जाता है तथा यह बल सूर्य के तुला राशि में स्थित होने पर सबसे कम हो जाता है इसी मे आकर सूर्य नीच के माने जाते हैं तथा सूर्य कुंडली में अपनी कुछ अन्य स्थिति के कारण तथा बुरे ग्रहों के प्रभाव में आने के कारण भी बलहीन हो जाते हैं ।
 
सूर्य उज्ज्वल एवं ज्वलंत ग्रह है, इसकी शक्ति द्वारा जीव एवं सृष्टि का विस्तार होता है. सूर्य समस्त उत्पत्ति का कारण है, परिवार में सूर्य कर्ता है, राज्य में राजा है, ग्राम में मुखिया, ग्रहों में सबसे प्रमुख हैं । आध्यात्मिक विद्या, अग्नि एवं तेज है, अधीनता स्वीकार नहीं करता. वह आदेश देता है किसी के आदेश का पालन नही करता. अपने महत्व एवं मर्यादा को समझता हैं. जिसका सूर्य बलवान है, वह उन्नति, वृद्धि, निर्माण करने वाला होता है. सूर्य हृदय का कारक है तथा इसके अलावा सूर्य नेत्र ज्योती का भी कारक है ।
 
कुण्डली में सूर्य के बल के मुताबिक जीवन में शक्ति होती है जिस कुंडली में सूर्य कमजोर रहता है वह जातक शारीरिक रूप से कमजोर होता है, इसलिए दूसरे ग्रह भी पूर्ण फल नहीं दे पाते. फलित ज्योतिष में सूर्य की अन्य ग्रहों से दूरी से पता चलता है. उसका नीच, उच्च, स्वग्रही, मित्र या शत्रु ग्रही तो नहीं यह तथ्य फलित ज्योतिष में महत्वपूर्ण है ।  सूर्य कि लग्न में स्थिति जातक कि आकृति, शारीरिक गठन, वर्ण रंग, रूप प्रभावित करती है. दशम भाव का सूर्य अधिक बलवान माना जाता है. सूर्य का कुण्डली में कमजोर होना बुरे प्रभाव देता है. कुंडली का अध्ययन करते समय कुंडली में सूर्य की स्थिति, बल तथा कुंडली के दूसरे शुभ तथा अशुभ ग्रहों के सूर्य पर प्रभाव को ध्यानपूर्वक देखना अति आवश्यक होता है ।

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