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कुंभ से जुड़ी प्राचीन मान्यता क्या है, जानें पूरी कहानी

Myjyotish Expert Updated 26 Dec 2020 11:39 PM IST
Astrology
Astrology - फोटो : Myjyotish
सनातन धर्म में कुंभ स्नान को बहुत उचित माना जाता है इससे जुड़ी कहानी यह दर्शाती है की देवताओं ने ऐसा किया तो इंसान भी इसे करके अपने कष्ट, दुख, पाप मिटा सकता है और अमर हो सकता है। कुंभ के संबंध में समुद्र मंथन की कथा बहुत प्रचलित है। इस कथा के मुताबिक प्राचीन समय में एक बार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण स्वर्ग श्रीहीन यानी स्वर्ग से ऐश्वर्य, धन, वैभव समाप्त हो गया था। जिसके बाद सभी देवता इस समस्या से निकलने के लिए भगवान विष्णु के पास गए थे। तब भगवान विष्णुजी ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा, और अमृत पीने से सभी देवता अमर हो जाएंगे। देवताओं ने तब ये बात असुरों के राजा बलि को बताई. उसके बाद वो भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। इस मंथन के दौरान वासुकि नाग की नेती बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया था। समुद्र मंथन में 14 रत्न निकले थे। इन रत्नों में कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रंभा, महालक्ष्मी, वारुणी देवी, चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान धनवंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले थे। अमृत कलश निकला तो सभी देवता और असुर उसको पाना चाहते थे। अमृत पाने के लिए देवताओं और असुरो में युद्ध होने लगा।युद्ध के बिच राहु नामक असुर नें अमृत पी लि थी. फिर देवताओं ने तुरंत उसका सिर काट दिया परन्तु अमृत पीने के कारण उसका सिर जीवित रहा. एक पुरानी मान्यता के मुताबिक जब भी राहू सूर्य को निगल लेता है तब सूर्य ग्रहण लगता है।

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समुद्र मंथन के द्वारा मिले हर चिझ यहां तक कि 4 वेद भी देवताओं के बिच बाट दिए गए थे. देवताओं और असुरो के लड़ाई में कलश से अमृत की बूंदें चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में गिरी थीं। ये युद्ध 12 वर्षों तक चला था, इसलिए इन 4  स्थानों पर हर 12 वर्ष में एक बार कुंभ मेला लगता है। इस मेले में सभी अखाड़ों के साधु-संत और सभी श्रद्धालु यहां आकर पवित्र नदियों में स्नान करते है और पूजन करते है।

कलशस्य गुखे विष्णु: कण्ठे रूद्र: समाश्रित:
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:..
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्त द्वीप वसुन्धरा
ऋग्वेदोथ यजुर्वेदों सामवेदो अथर्वण:
अंगैश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:..

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