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Home ›   Blogs Hindi ›   According to Lal Kitab, the conjunction of special planets, know when Rajyoga is formed

Lal Kitab Yog: लाल किताब के अनुसार विशिष्ट ग्रहों की युति, जानें कब बनते हैं राजयोग

Nisha Thapaनिशा थापा Updated 10 Jul 2024 01:57 PM IST
लाल किताब के अनुसार ग्रहों की युति
लाल किताब के अनुसार ग्रहों की युति - फोटो : My Jyotish
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Lal Kitab Yog: हमारे कुंडली हमारे व्यक्तित्व, हमारा भूत, भविष्य और वर्तमान के विषय में बताती है। ठीक इसी प्रकार से जब कुंडली में ग्रहों की युति होती है और कोई विशिष्ट ग्रह जातक की कुंडली में विराजमान होते हैं, तो उन्हें शुभ फल देते हैं। ऐसा ही कुछ लाल किताब में भी बताया गया है। लाल किताब के अनुसार कुछ ऐसे ग्रह हैं जो एक दूसरे के साथ मिलकर विशिष्ट योग का निर्माण करते हैं, लेकिन कुछ योग से जातक को नकारात्मक फल भी मिलता है। तो आइए इस लेख के जरिए जानते हैं कि लाल किताब के अनुसार कौन से ग्रहों की युति शुभ होती है।
 

लाल किताब के विशिष्ट योग

 

यदि किसी जातक की कुंडली में तुला लग्न है, यानि पहले भाव तुला है और तुला राशि के स्वामी शुक्र ग्रह एवं शनि पांचवे घर में बैठा हो और दोनों की युति बन रही हो, तो जातक एक अच्छा ज्योतिषी बनता है। 

यदि किसी जातक की कुंडली के लग्न में मिथुन राशि है और मिथुन राशि के स्वामी बुध ग्रह 11 में सूर्य ग्रह के साथ हो, इसके साथ ही गुरू की दृष्टि  लग्न भाव में पड़ रही है, तो जातक चारों दिशाओं में विजय प्राप्त कर लेता है, इसके साथ ही ये जातक जो भी कार्य करें उन्हें हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है।

यदि किसी जातक की कुंडली के तीसरे भाव में शनि ग्रह विराजमान हैं, तो आप समझ जाएं कि इन जातकों का व्यवसाय से अर्जित धन केलव अपने जीवन यापन के लिए होता है और इन जातकों के पास भविष्य निधि के तौर पर कुछ नहीं बचता है।  

यदि कोई जातक वृश्चिक लग्न राशि में पैदा होता है और जातक की कुंडली के पहले भाव में सूर्य ग्रह विराजमान है, इसके साथ ही वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल ग्रह दूसरे भाव में हो और उस स्थान पर बुध भी है, तो ये युति जातकों के लिए अशुभ मानी जाती है। ऐसी स्थिति में जातक अपनी युवा अवस्था के बाद मानसिक रूप से पीड़ित हो जाता है।

जिन जातकों का जन्म 13 अप्रैल से लेकर 23 अप्रैल के बीच होता है, वह जातक काफी प्रभावशाली होते हैं और इन्हें अधिकतर कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। क्योंकि इस अवधि के दौरान जातक सूर्य का उच्च प्रभाव रहता है और सूर्य का सकारात्मक प्रभाव जातक की कुंडली पर पड़ने लगता है। 

यदि किसी जातक की कुंडली के नौवें और दसवें भाव में उपस्थित ग्रह का आपस में सकारात्मक संबंध होता है, तो यह राजयोग कहलाता है। लेकिन यदि नौवें भाव के ग्रह दसवें भाव में होते हैं, तो ऐसी स्थिति में ये ज्यादा बलवान नहीं होता है।

जब किसी जातक की कुंडली में 2 उच्च घरों के स्वामी एक-दूसरे के भावों में बैठे हों, तो ऐसी स्थिति प्रबल राजयोग के कारक बनाती है। 

तो इस प्रकार से इन ग्रहों की युति जातकों की कुंडली में सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव डालती है। यदि आप इससे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे ज्योतिषाचार्यों से संपर्क करें।
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